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जब बाढ़ ने रोके रास्ते, रिश्तों ने खोली राह; बीमार नानी की सेवा के लिए भागलपुर पहुंचा नाती

Published: Sun, 20 Sep 2026 12:18 PM (IST)

अकबरनगर में बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी जनजीवन सामान्य नहीं हुआ है, लोग कीचड़, गंदगी और रोजगार की समस्या से जूझ रहे हैं।

बाढ़ के पानी के बीच बीमार नानी की देखभाल करता नाती। जागरण

बाढ़ के पानी के बीच बीमार नानी की देखभाल करता नाती। जागरण

HighLights

  1. कीचड़, गंदगी और रोजगार की समस्या से जूझ रहे लोग।

  2. बाढ़ के बीच लोगों ने एक-दूसरे का सहारा बनकर जीना सीखा।

  3. नाती ने बाढ़ के रास्ते पार कर बीमार नानी की सेवा की।

नमन कुमार, अकबरनगर। बाढ़ का पानी उतरने लगा है, लेकिन अकबरनगर के गांवों में जिंदगी अभी सामान्य नहीं हुई है। कहीं घरों के आसपास गन्दा पानी जमा है, कहीं कीचड़ ने रास्ते रोक रखे हैं तो कहीं बाढ़ के साथ बह गए रोजगार को फिर खड़ा करने की चिंता है। इन मुश्किलों के बीच लोगों ने एक-दूसरे का सहारा बनकर जीना सीखा है।

बाढ़ ने घरों को जरूर घेरा, लेकिन रिश्तों की गर्माहट को नहीं डुबो सकी। इसी संघर्ष के बीच एक तस्वीर रिश्तों की गहराई बयां करती है।

रनुचक में नानी ललिता देवी की तबीयत खराब होने की खबर मिली तो नाती ने रास्ते की परवाह नहीं की। जलजमाव और बाढ़ से घिरे रास्तों के बीच किसी तरह ननिहाल पहुंचा।

नानी की हालत देख उनकी सेवा में जुट गया। दवा, भोजन और जरूरत की छोटी-छोटी चीजों का इंतजाम करने लगा। उसके लिए बाढ़ के बीच ननिहाल पहुंचना मजबूरी नहीं, उस रिश्ते का कर्ज था, जिसे वह मुश्किल वक्त में चुकाना चाहता था।

अकबरनगर, श्रीरामपुर, भवनाथपुर, किशनपुर, खुटाहा, शाहाबाद, बसंतपुर, मकंदपुर और इंग्लिश चिचरौंन के निचले इलाकों में बाढ़ ने लोगों की जिंदगी उलट दी। किसी का घर पानी से घिरा तो किसी की दुकान बंद रही।

मजदूरी ठप हुई तो परिवार की रोजी-रोटी की चिंता सताने लगी। मवेशियों के लिए चारा जुटाना भी चुनौती बन गया। राहत शिविरों में गुजरे दिनों के बाद अब लोग घर लौट रहे हैं।

मगर घर लौटना भी आसान नहीं। आंगन में जमा पानी, दीवारों पर नमी, चारों तरफ कीचड़ और काले पानी की दुर्गंध बाढ़ के जाने के बाद का दर्द बयां कर रही है।

पानी घटा, चिंता नहीं लोगों को सबसे ज्यादा चिंता बीमारी और रोजगार की है। लंबे समय से जमा पानी अब सड़ने लगा है। सफाई और जलनिकासी नहीं हुई तो परेशानी बढ़ने की आशंका है। जिन घरों में चूल्हा कई दिनों तक ठीक से नहीं जला, उनके सामने अब फिर से जिंदगी शुरू करने की चुनौती है।

फिर भी लोग टूटे नहीं हैं। पड़ोसी ने पड़ोसी का साथ दिया, किसी ने भोजन पहुंचाया तो किसी ने चारा। बाढ़ ने सिखाया कि मुश्किल वक्त में इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका धैर्य और अपनों का साथ है।

प्रकृति के सामने इंसान की तैयारी छोटी पड़ सकती है। पक्के मकान, दुकानें और वर्षों की मेहनत देखते-देखते पानी से घिर गई।

रोजगार बंद हुआ तो रोज कमाकर खाने वालों के सामने दो वक्त की रोटी का सवाल खड़ा हो गया। इससे जलनिकासी, सुरक्षित आवागमन और आपदा से पहले की तैयारी की अहमियत सामने आई।

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