जमुई, जेएनएन। भगवान की यह दिव्य धरती को उजागर करने वाला भव्य तीर्थोद्धार जब से शुरू हुआ है तब से इस भूमि पर जैन धर्म के विविध आयोजन होता रहा है। ये बातें शुक्रवार को क्षत्रियकुण्ड ग्राम भगवान महावीर की जन्मकल्याणक भूमि में क्षत्रियकुण्ड तीर्थोद्धारक जैनाचार्य नयबद्र्धन सूरीश्वर जी महाराज ने उपधान तप समापन समारोह में कही।उपधान तप की चर्चा करते जैनाचार्य ने कहा कि पर्यूषण पर्व यानी चार महीने का वर्षावास कार्यक्रम के पश्चात उपधान तप (साधना) किया गया जिसमें साधु संतों के अलावा जैन श्रेष्ठियों के द्वारा एक बड़ी तपस्या चल रही थी।

दो माह तक जीना पड़ा साधु जैसा जीवन 

दो महीने के लिए संसारी जीवन अर्थात साधु जैसा जीवन जीना पड़ा। वह भी एक समय का फलाहार व गर्म पानी का सेवन करने के साथ पूरे दो माह तक तपस्या के क्रम में स्नान करने पर पूर्ण पाबंदी रहती है। कठिन तप साधना के इस कठिनाई को सुनते ही आम लोगों की होश उड़ जाती है। ऐसे उपधान तप में साधना कार्यक्रम में आज कोरोना जैसी महामारी में भी साधु संतों के अलावा जैन श्रेष्ठी मिलाकर कुल 51 लोग इस उपधान तप (साधना) में शामिल हुए थे। आठ साल से लेकर बड़ी उम्र के लोग बड़े ही आस्था से साधना कर रहे थे।

विभिन्‍न राज्‍यों के जैन श्रद्धालुओं ने लिया हिस्‍सा 

इस तपश्चर्या को पूर्ण होने पर माला परिधान का विधान किया गया जिसे मोक्ष माला रोपण कहा जाता है। इस क्रिया का बहुत ही महत्व है। मोक्षमाला कार्यक्रम में तपस्वी के स्वजन पश्चिम बंगाल भाजपा के युवा प्रदेश अध्यक्ष जिगर भाई दोशी के साथ नंदप्रभा परिवार के मितेश भाई व मोक्षा सेठ, उमेश भाई समेत मुंबई, अहमदाबाद, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि से जैन श्रद्धालु उपस्थित होकर अपने भगवान प्रभु के सेवार्थ बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई। इस दौरान जैनाचार्य के द्वारा विधि-विधान पूर्वक मंत्रोच्चार के साथ परिधान माला समारोह पूर्वक किया गया। पांच घंटे तक चले समारोह में श्रद्धालुओं ने खुशी और उमंग के बीच नाचते-गाते रहे। भगवान महावीर के इन श्रद्धालुओं के आवास एवं भोजन की व्यवस्था के साथ चातुर्मास एवं उपधन तप अर्थात तपस्या में शामिल साधु संतों के अलावा जैन श्रेष्ठियों के सेवार्थ सीके मेहता एवं निमेश भाई कंपानी अपनी अहम भूमिका निभाई। इस कार्यक्रम के मौके पर जैनाचार्य ने अपने एक शिष्य को गणिपद भी प्रदान किया।

 

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