बेगूसराय : '' विश्व मानव का तूर्य हूं मैं/उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मैं'' का उद्घोष करने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का दालान जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। स्थिति इसके आजकल में ढह पड़ने वाली है, बावजूद इसके शासन-प्रशासन आंख मूंदे है। कुछेक वर्ष पहले इसके जीर्णोद्धार को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई थी, परंतु वह भी अब ठंडी पड़ चुकी है। ऐसे में यह 'धरोहर' कभी भी 'जमींदोज' हो सकता है।

बड़े शौक से राष्ट्रकवि ने बनवाया था यह दालान : दिनकर जी ने पठन-पाठन को लेकर बड़े ही शौक से यह दालान बनवाया था। वे पटना अथवा दिल्ली से जब भी गांव आते थे, तो इस जगह उनकी 'बैठकी' जमती थी। यहां पर वे अपनी रचनाएं बाल सखा, सगे-संबंधी, परिजन-पुरजन व ग्रामीणों को सुनाते थे। फुर्सत में लिखने-पठने का कार्य भी करते थे।

जीर्णोद्धार के लिए आए पांच लाख रुपये लौट गए : दिनकर पुस्तकालय सिमरिया के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान कोषाध्यक्ष रामनाथ सिंह ने बताया कि, वर्ष 2009-10 में मुख्यमंत्री विकास योजना से इसके जीर्णोद्धार के लिए पांच लाख रुपया जिला में आया, परंतु तकनीकी कारणों से वह वापस चला गया। जानकारी अनुसार दिनकर जी के परिजनों ने उक्त जमीन की रजिष्ट्री महामहिम राज्यपाल, बिहार, भारत सरकार के नाम से नहीं की और पैसे वापस लौट गये।

रामनाथ सिंह की माने तो, न तो दिनकर जी के परिजनों ने और न ही जिला प्रशासन ने इसमें कोई खास दिलचस्पी दिखाई।

क्या कहते हैं साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी : युवा समीक्षक व राष्ट्रकवि दिनकर स्मृति विकास समिति, सिमरिया के सचिव मुचकुंद मोनू कहते हैं, उक्त दालान की उपेक्षा दुखी करता है। कहीं से भी तो पहल हो। अब तो यह नष्ट होने के कगार पर पहुंच चुका है। जबकि, जनकवि दीनानाथ सुमित्र का कहना हुआ कि, दिनकर का दालान राष्ट्र का दालान है। यह हिंदी का दालान है। उनके परिजनों को यह समाज-सरकार को सौंप देना चाहिए।

अब जरा दिनकर जी के एकमात्र जीवित पुत्र केदार सिंह की सुनिए..' पिताजी ने हमारे चचेरे भाई आदित्य नारायण सिंह के विवाह के अवसर पर इसे बनाया था। इसके जीर्णोद्धार को लेकर पांच लाख रुपये आये थे, यह हमारी नोटिस में नहीं है। यह अब मेरे भतीजे अरविंद बाबू की देखरेख में है।'

बेगूसराय के डीडीसी प्रभात कुमार सिन्हा का कहना है किमैं तो नया हूं। कागज निकलवाते हैं। दिनकर जी हमलोगों के गौरव हैं। उक्त दालान के जीर्णोद्धार को लेकर हर संभव प्रयास किया जायेगा। खैर, कल क्या होगा, यह तो समय के गर्भ में है। फिलहाल दिनकर जी के शब्दों में ही कहूं, तो- 'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।'

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