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शक्तिपीठ तिलडीहा में सावन जैसा नजारा! 18 KM नंगे पांव चल पहुंचे 1 लाख श्रद्धालु, शिव की तर्ज पर दुर्गा पर किया जलार्पण

Published: Sun, 11 Oct 2026 10:32 PM (IST)

Banka Tildiha Mandir Shardiya Navratri: बांका के शंभुगंज स्थित तिलडीहा मंदिर में शारदीय नवरात्र के पहले दिन एक लाख से ...और पढ़ें

Banka Tildiha Mandir Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन बांका जिले के शंभुगंज स्थित सिद्ध शक्तिपीठ तिलडीहा मंदिर में भीड़।

Banka Tildiha Mandir Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन बांका जिले के शंभुगंज स्थित सिद्ध शक्तिपीठ तिलडीहा मंदिर में भीड़।

HighLights

  1. तिलडीहा मंदिर में शारदीय नवरात्र पर एक लाख श्रद्धालु पहुंचे।

  2. सुल्तानगंज से 18 किमी नंगे पांव चलकर गंगाजल अर्पित किया।

  3. यह परंपरा सावन की कांवर यात्रा की तरह ही लोकप्रिय है।

संवाद सूत्र, शंभुगंज (बांका)। Banka Tildiha Mandir Shardiya Navratri:  कांधे पर गंगाजल का कलश, नंगे पांव और जुबां पर ‘हर-हर महादेव’ की जगह गूंजता ‘जय माता दी’ का गगनभेदी उद्घोष! दृश्य देखकर ऐसा आभास हो रहा था मानो सावन का तपस्वी मिजाज आश्विन की शारदीय नवरात्र में उतर आया हो।

सुल्तानगंज के अजगैवीनाथ धाम से उत्तरवाहिनी गंगाजल उठाकर कांवरियों की भांति नंगे पांव चलने की यह तस्वीर आमतौर पर सावन मास में बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए जेहन में उभरती है। लेकिन बांका जिले के शंभुगंज स्थित सिद्ध शक्तिपीठ तिलडीहा मंदिर में पिछले कुछ दशकों से लोक-आस्था की यह विहंगम और अनूठी परंपरा विराट रूप ले चुकी है। शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन करीब एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने यहां पहुंचकर मां के चरणों में जलार्पण किया।

18 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा

शनिवार की मध्यरात्रि से आरंभ हुआ जलार्पण का यह महाअनुष्ठान रविवार की देर संध्या तक अविराम गति से चलता रहा। हाथों में पीतल व कांसे के कलश लिए श्रद्धालुओं का कारवां अजगैवीनाथ धाम से शंभुगंज की ओर अनवरत बढ़ता रहा। 18 किलोमीटर के इस पथरीले और दुर्गम सफर को नंगे पांव तय करने वालों में सिर्फ बांका ही नहीं, बल्कि पड़ोसी मुंगेर, भागलपुर और झारखंड के देवघर व गोड्डा जिले के हजारों श्रद्धालु शामिल थे।

Slug _ tildiha temple 1 lakh devotees offer ganga jal in banka navratri

रात से शाम तक चला जलार्पण

भोर के चार बजते ही तिलडीहा का कोना-कोना भक्ति के रंग में रंग गया। शंभुगंज के बगीचों से लेकर तारापुर के गोगाचक नहर मोड़ तक करीब एक किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में केवल श्रद्धालुओं का जनसमुद्र ही नजर आ रहा था। मंदिर परिसर में पैर रखने तक की जगह नहीं बची थी, फिर भी घंटों लंबी कतारों में लगकर मां के विग्रह पर गंगाजल अर्पित करने की ललक हर चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।

मन्नत पूरी होने पर नंगे पांव खिंचे चले आते हैं भक्त

तिलडीहा मंदिर के प्रधान पुजारी श्याम आचार्य ने बताया कि शिवालयों की भांति किसी शक्तिपीठ पर इस तरह सामूहिक जलार्पण की परिपाटी बीते एक दशक में एक विशाल जन-अनुष्ठान में बदल चुकी है। यह लोक-श्रद्धा का वह विस्तार है जहां मन्नत पूरी होने पर भक्त स्वतः खिंचे चले आते हैं।

Tildiha Temple 1 Lakh Devotees Offer Ganga Jal in Banka Navratri (1)

देवघर से पहुंचे श्रद्धालु सिंटू कुमार ने बताया कि तिलडीहा मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण वे पिछले चार वर्षों से लगातार जल चढ़ाने आ रहे हैं। वहीं, बांका के सूईया बाजार निवासी सुजीत कुमार ने बताया कि संतान और रोजगार से जुड़ी मन्नत पूरी होने के बाद वे नंगे पांव जलार्पण के लिए पहुंचे। मुंगेर के जमालपुर से आए गौरव कुमार ने परिवार की सुख-शांति व समृद्धि की कामना के साथ माता के दरबार में शीश नवाया।

शाक्त और वैष्णव का अद्भुत एकात्म

तिलडीहा सिद्धपीठ का इतिहास और इसका स्वरूप भारतीय संस्कृति के दुर्लभ समन्वय का परिचायक है। मंदिर के पूर्व सचिव शंभूनाथ दास के अनुसार, वर्ष 1603 में बंगाल के नदिया जिले (दालपोलसा गांव) से आए राड़ी कायस्थ परिवार के साधक हरबल्लव दास को इस घने जंगल में भगवती की स्वप्न-प्रेरणा मिली थी, जिसके बाद इस सिद्धपीठ की नींव पड़ी। आज यह क्षेत्र उनके नाम पर हरिवंशपुर के रूप में जाना जाता है।

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एक वेदी पर 13 विग्रह

इस मंदिर की सबसे चमत्कारी और अद्वितीय विशेषता इसकी वेदी है, जहां एक ही मेढ़ (चौखट) पर एक साथ 13 विग्रह विराजते हैं। यहां आदिशक्ति महादुर्गा और संहारक महाकाली के साथ प्रेम और करुणा के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण भी विराजमान हैं। शिव-पार्वती, श्रीगणेश, कार्तिकेय और महिषासुर के सम्मिलित स्वरूप के कारण ही इस सिद्धपीठ को 'श्रीकृष्ण काली भगवती' कहा जाता है।

देश में शाक्त और वैष्णव मत का ऐसा समन्वय अन्यत्र दुर्लभ है। चार शताब्दी पूर्व संस्थापक द्वारा लाया गया ऐतिहासिक खड्ग आज भी मंदिर की अमूल्य धरोहर है, जिससे आज भी पूजा की पहली और अंतिम बलि दी जाती है।

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