मजदूरों के बच्चे टाई-जूते पहनकर पहुंचे स्कूल, गले मिले रहमान व कन्हैया! बिहार की खुशबू ने राष्ट्रपति को किया प्रभावित
National Teacher Award 2026: बांका की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी को बिदायडीह गांव में शिक्षा और सामाजिक सौहार्द लाने के ...और पढ़ें

National Teacher Award 2026: बांका की शिक्षिका खुशबू कुमारी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार, बदल दी बिदायडीह स्कूल की सूरत
HighLights
राष्ट्रपति ने खुशबू कुमारी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से नवाजा।
बिदायडीह गांव में शिक्षा और सामाजिक सौहार्द का बदलाव।
बच्चों की उपस्थिति बढ़ी, यूनिफॉर्म और सुरक्षित स्कूल माहौल।
जागरण संवाददाता, बांका। National Teacher Award 2026: कहते हैं कि यदि निष्ठा सच्ची हो और संकल्प अडिग, तो इंसान बंजर जमीन पर भी फूल खिला सकता है। बांका शहर के अंतिम छोर पर स्थित अभावों और संसाधनों की कमी से जूझती बिदायडीह बस्ती आज बदलाव के ऐसे ही एक प्रेरणादायी अध्याय की गवाह बनी है।
कभी अशिक्षा, गरीबी और सांप्रदायिक तनाव के साए में जीने वाला यह गांव आज ज्ञान, सौहार्द और समरसता की मिसाल पेश कर रहा है। इस ऐतिहासिक कायापलट की सूत्रधार हैं प्राथमिक विद्यालय बिदायडीह की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी, जिन्हें शिक्षक दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा 'राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार-2026' से सम्मानित किया गया।
बिदायडीह गांव में मुख्य रूप से मुस्लिम अंसारी समुदाय और महादलित हिंदू परिवार पीढ़ियों से आबाद हैं। घोर अशिक्षा और मुफलिसी के कारण यह गांव अक्सर आपसी झगड़ों और सामाजिक तनाव में उलझा रहता था। पिछले वर्ष जब खुशबू कुमारी ने यहां बतौर प्रधान शिक्षिका पदभार संभाला, तो उनके सामने चुनौती सिर्फ बच्चों को अक्षर ज्ञान देने की नहीं, बल्कि नफरत की दीवारों को गिराकर सामाजिक सद्भाव की खुशबू बिखेरने की थी।
घर-घर दस्तक और संवाद: 90 फीसदी उपस्थिति का चमत्कारी सफर
खुशबू ने सबसे पहले विद्यालय को गांव के सामाजिक जीवन का केंद्र बनाया। उन्होंने अभिभावकों के साथ नियमित संवाद शुरू किया और शिक्षा के महत्व से परिचित कराया। उनकी मेहनत का असर दो ही महीने में दिखने लगा— नामांकित बच्चों में से 90 प्रतिशत से अधिक छात्र नियमित रूप से कक्षा में पहुंचने लगे। खुशबू की कार्यप्रणाली का सबसे प्रेरक पहलू यह रहा कि यदि कोई बच्चा एक दिन भी स्कूल नहीं आता, तो वे शाम ढलते ही खुद उसके घर पहुंच जातीं और अभिभावकों से कारण पूछतीं।
बांका के बिदायडीह प्राथमिक विद्यालय की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी को नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार-2026 से नवाजा
अल्पसंख्यक व महादलित आबादी वाले तनावग्रस्त गांव में जगाई ज्ञान की अलख; अब्दुल, रहमान, कन्हैया और अमन के बीच कायम हुई मिसाल
मजदूरी करने वाले अभिभावकों को किया प्रेरित; शत-प्रतिशत बच्चे अब टाई, बेल्ट, आई-कार्ड, जूते-मोजे और फुल ड्रेस में आते हैं स्कूल
कक्षा में अनुपस्थित रहने वाले बच्चों के घर शाम को खुद पहुंचती थीं शिक्षिका; नदी पर डायवर्सन बनवाकर सुगम बनाया बच्चों का रास्ता
इसके बाद शुरू हुआ स्कूल का कायाकल्प। खुशबू ने ईंट-भट्ठों और निर्माण स्थलों पर दिहाड़ी मजदूरी करने वाले अभिभावकों को इस बात के लिए तैयार किया कि वे अपने बच्चों को पूरे मान-सम्मान के साथ स्कूल भेजें। छह महीने के भीतर बिदायडीह जिले का ऐसा पहला सरकारी प्राथमिक विद्यालय बन गया, जहां सभी बच्चे साफ-सुथरी ड्रेस, टाई-बेल्ट, चमचमाते जूते-मोजे, स्वेटर और गले में आई-कार्ड डालकर शान से स्कूल आने लगे।
मिट गईं मजहब की दीवारें: अब्दुल और कन्हैया बने पक्के दोस्त
स्कूल का यह सकारात्मक माहौल गांव के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर छोड़ गया। साल भर के भीतर गांव में तनाव और विवाद की एक भी घटना नहीं हुई। नफरत के अंधेरे को मासूम बच्चों की दोस्ती ने लील लिया। आज उसी विद्यालय के प्रांगण में अब्दुल और रहमान, कन्हैया और अमन के साथ बैठकर न केवल ककहरा सीख रहे हैं, बल्कि साथ खेलते और लंच साझा करते हैं।
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नई दिल्ली में सम्मान समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खुशबू के इन अनूठे प्रयासों की सराहना की। वहीं दिल्ली से लौटने पर मंगलवार को पटना में बिहार के शिक्षा मंत्री और वरीय प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका गर्मजोशी से नागरिक अभिनंदन किया तथा उन्हें राज्यभर के शिक्षकों को प्रेरित करने की विशेष जिम्मेदारी सौंपी।
खेल-खेल में पढ़ाई और बच्चों की सुरक्षा के लिए नदी पर डायवर्सन
अपने 13 साल के शिक्षण करियर में खुशबू कुमारी ने शिक्षा को आनंददायी बनाने के लिए कई नवाचार किए हैं। इससे पहले वे कटोरिया प्रखंड के मध्य विद्यालय कठौन में पदस्थापित थीं। वहां उन्होंने बिहार शिक्षा विभाग की 'चहक' योजना के तहत पारंपरिक ब्लैकबोर्ड शिक्षण को दरकिनार कर गीत, संगीत, अभिनय और नृत्य के जरिए वर्णमाला और गणित के कठिन सूत्रों को सिखाना शुरू किया।
बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए उन्होंने एक्टिविटी आधारित बेहद संवेदनशील तरीकों से 'गुड टच-बैड टच' की सीख दी, जिसके वीडियो इंटरनेट मीडिया पर राष्ट्रीय स्तर पर छा गए। इतना ही नहीं, बिदायडीह स्कूल तक पहुंचने के रास्ते में पड़ने वाली बरसाती नदी बच्चों के लिए बाधा न बने, इसके लिए उन्होंने स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के सहयोग से नदी पर डायवर्सन का निर्माण भी कराया।
'पढ़ाई बोझ नहीं उत्सव है'- सरकारी स्कूल से राष्ट्रपति भवन तक का सफर
खुशबू कुमारी का मानना है कि पढ़ाई बच्चों के लिए किसी सजा या बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक उत्सव की तरह होनी चाहिए। स्वयं प्राथमिक से लेकर इंटरमीडिएट तक की शिक्षा सरकारी विद्यालयों से पूरी करने वाली खुशबू ने इग्नू से स्नातक और डायट बांका से डीएलएड किया है।
खुशबू के पति मनीष कुमार आनंद भी बांका प्रखंड के एनपीएस कोला में प्रधान शिक्षक हैं और कदम-कदम पर उनके सहयोगी रहे हैं। अपनी इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय वे अपने परिवार, समर्पित विभागीय अधिकारियों और बिदायडीह के उन मेहनतकश अभिभावकों को देती हैं, जिन्होंने अपनी गरीबी के बावजूद एक शिक्षिका के आह्वान पर अपने बच्चों के सपनों में नए पंख लगाए।
