औरंगाबाद । गोह के भृगुरारी में न्यूनतम 1200 साल प्राचीन इतिहास जमींदोज है। इतिहास का सूत्र गव्य काव्य के प्रमाणित आदि कवि वाणभट्ट के पूर्वजों से जुड़ता है, जिनका काल 7वीं सदी रहा है। यहा का गढ़ देखकर कोई समझ सकता है कि यह प्राचीन है। यहा जब तब खुदाई के दरम्यान पुरातात्विक महत्व की सामग्रिया मिलती रही हैं। आवश्यकता विधिवत पुरातात्विक उत्खनन की है, ताकि इतिहास का खो गया क्षण प्रमाणित हो सके। यदि उत्खनन हो तो यह भी सच साबित हो सकता है कि वाणभट्ट का जन्म ग्राम कौन है। भृगुरारी जिस भृगु ऋषि के नाम पर बसा था, वे भृगु वाण के पूर्वज माने जाते हैं। वाण के पिता चित्रभानु 11 भाई थे, जिसमें सबसे बड़े भृगु थे। भृगु की पत्नी पुलोमा थीं, इन्हीं के पुत्र थे दैत्यगुरु शुक्राचार्य। कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला लगता है। मेला लगना कब से प्रारंभ हुआ, इसका कोई साल संवत स्पष्ट नहीं है लेकिन पुनपुन और मदार नदियों के संगम पर स्नान करना पापनाशक माना गया है। पं. लालमोहन शास्त्री ने बताया कि यहा आनंद रामायण के अनुसार भगवान राम ने विश्राम किया था और मंदारेश महादेव की स्थापना की थी, जब वे गया श्राद्ध के लिए जा रहे थे।

भृगुरारी नामकरण का इतिहास

विचारणीय है कि भृगुरारी नाम क्यों पड़ा। इसे अप्रैल 1983 में प्रकाशित राष्ट्रभाषा परिषद पत्रिका में च्यवन ऋषि के पिता भृगु जी का आश्रम बताया गया है। इनकी पत्नी पुलोमा थी, लेकिन पुलोमा नाम के ही एक दैत्य ने उनका अपहरण कर लिया। भरारी या भृगुरारी भृगुपुरी का अप्रभंश हो सकता है। भृगु जलप्रपात को भी कहा जाता है। महत्वपूर्ण है कि यहा पुनपुन में उपर से मदार का पानी गिरता है। भृगुरारी शब्द भी भृगुरारी से मिलता शब्द है, ग्रीवा से उपर और मस्तक से नीचे का भाग रराटी कहलाता है। भागवत के अनुसार तपोलोक को भगवान विष्णु की रराटी बताया गया है। भृगु ऋषि का आश्रम होने के कारण यह नामकरण हुआ।

न-कटी भवानी की प्रथम पूजा शुक्राचार्य ने की

यहीं न-कटी भवानी का मंदिर है। श्री शास्त्री ने बताया कि श्रीमद् देवीभागवत के अनुसार महर्षि भृगु की पत्नी अपने शरण में आए दैत्यों की रक्षा करती थीं इसलिए देवतागणों की निंदा प्रभावित होती थी। विष्णु ने यह देख अपने चक्र से भृगु पत्नी का मस्तक काट दिया। जब महर्षि भृगु आश्रम आए तो पत्नी की स्थिति देख क्रोधित हो विष्णु को अभिशाप दे दिया। बाल्मिकी रामायण के अनुसार विष्णु ने निरपराध स्त्री की हत्या की, इसलिए पृथ्वी पर कई बार अवतार लेना पड़ा और गर्भ का दुख झेलना पड़ा। महर्षि ने अपनी पत्नी को शल्य क्रिया से स्वस्थ्य कर दिया। दैत्यों ने इस चमत्कार को देख कहा - न-कटी, न-कटी मां, न-कटी भवानी। यानि काटने के बाद भी जो जीवित हो गई। दैत्याचार्य शुक्राचार्य ने इसी वक्त मा की प्रथम पूजा की और न-कटी भवानी के नाम से ख्याति प्राप्त हुई। पद्मासन में मा की प्रतिमा है, इनका मस्तक नीचे हैं। इनकी जयंती वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को होती है। कुछ लोग इन्हें छिन्नमस्तिका नाम दे रहे हैं, श्री शास्त्री के अनुसार यह गलत होगा।