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हाइब्रिड के दौर में 'देशी खीरे' की खेती, औरंगाबाद के जनेश्वर मेहता पुरानी विरासत से कर रहे कमाई 

Published: Sat, 26 Sep 2026 04:11 PM (IST)

औरंगाबाद के चिल्हकी बिगहा गांव में किसान जनेश्वर मेहता देशी खीरे की खेती से परंपरा बचा रहे हैं, वहीं सुमंगल ...और पढ़ें

खीरे में कीटनाशक का छिड़काव। फोटो जागरण

खीरे में कीटनाशक का छिड़काव। फोटो जागरण

HighLights

  1. जनेश्वर मेहता देशी खीरे की खेती से परंपरा का संरक्षण कर रहे हैं।

  2. सुमंगल मेहता ग्राफ्टेड टमाटर से आधुनिक कृषि का प्रदर्शन कर रहे हैं।

  3. दोनों किसान औरंगाबाद के चिल्हकी बिगहा गांव में खेती कर रहे हैं।

ओम प्रकाश शर्मा, अंबा (औरंगाबाद)। खेती में सफलता के लिए एक ओर जहां किसान आधुनिक तकनीक और उन्नत बीजों का सहारा ले रहे हैं, वहीं कुछ किसान पारंपरिक बीज और देशी फसलों को बचाने में जुटे हैं।

चिल्हकी बिगहा गांव के जनेश्वर मेहता और सुमंगल मेहता खेती के इन दोनों रूपों की मिसाल पेश कर रहे हैं। जनेश्वर जहां देशी खीरे की खेती कर पारंपरिक बीजों को संरक्षित कर रहे हैं, वहीं युवा किसान सुमंगल आधुनिक तकनीक से ग्राफ्टेड टमाटर की खेती कर बेहतर आमदनी का प्रयास कर रहे हैं।

देशी खीरे में स्वाद के साथ परंपरा

किसान जनेश्वर मेहता ने करीब 15 कट्ठे में अगस्त में देशी खीरे की खेती की है। सितंबर में फसल निकलने लगी है। खेत में फसल पर दवा का छिड़काव करते मिले जनेश्वर ने बताया कि आज किसान अधिक उत्पादन के लिए परिष्कृत बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन पुराने देशी बीजों का संरक्षण भी जरूरी है।

देशी खीरे के स्वाद की अलग पहचान है और बाजार में इसकी मांग बनी रहती है। उन्होंने बताया कि बीज और खेती पर अब तक करीब पांच हजार रुपये खर्च हुए हैं।

अक्टूबर के अंत तक फसल निकलने की उम्मीद है। लागत निकालने के बाद तीन से चार हजार रुपये की आमदनी होने की संभावना है।

मौसम ने बढ़ाई परेशानी

जनेश्वर ने बताया कि पिछले तीन-चार दिनों से हो रही वर्षा और तेज हवा से खीरे के पौधों को नुकसान पहुंचा है। तेज हवा से फूल झड़ रहे हैं और खेत में पानी लगने से कुछ पौधे गलने लगे हैं। मौसम में सुधार होने पर फसल के फिर संभलने की उम्मीद है।

ग्राफ्टेड टमाटर से आधुनिक खेती की राह

इसी गांव के किसान सुमंगल मेहता आधुनिक कृषि का उदाहरण पेश कर रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से ग्राफ्टेड टमाटर के पौधे मंगाकर 10 कट्ठे में लगाए हैं।

लत्तरनुमा पौधे करीब डेढ़ से दो फीट के हो चुके हैं और इनमें फूल और फल आने लगे हैं। सुमंगल पिछले तीन वर्षों से इसकी खेती कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि पौधा करीब 11.50 रुपये की दर से मंगाया जाता है। सुमंगल के अनुसार इस वर्ष पौधों और उनकी देखरेख पर अब तक करीब 36 हजार रुपये खर्च हुए हैं।

फल आने तक कुल लागत करीब 50 हजार रुपये पहुंचने का अनुमान है। फसल तैयार होने के बाद खर्च निकालकर करीब एक लाख रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है।

उन्होंने बताया कि टमाटर के पौधे जमीन से करीब डेढ़ से दो फीट ऊपर तैयार होते हैं, इसलिए पानी से अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है।

हालांकि तेज हवा से फूल झड़ने की समस्या बनी हुई है। मौसम साफ होने पर पौधों के तेजी से विकसित होने और बेहतर फल की उम्मीद है।

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