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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 27, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सूर्य उपासना का केंद्र है देवकुंड सरोवर

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Published: Mon, 27 Oct 2014 06:52 PM (IST)

संवाद सूत्र, हसपुरा (औरंगाबाद) : गोह प्रखंड का देवकुंडधाम प्राचीन काल से सूर्य उपासना का केंद्र र

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संवाद सूत्र, हसपुरा (औरंगाबाद) :

गोह प्रखंड का देवकुंडधाम प्राचीन काल से सूर्य उपासना का केंद्र रहा है। यहां स्थित पवित्र सरोवर में स्नान करने हजारों छठ व्रती पहुंचते हैं। अ‌र्घ्य देने के समय सरोवर पर तिल रखने की जगह नहीं होती है। कहा जाता है कि सरोवर के नाम पर ही इस स्थान का नाम देवकुंड रखा गया। महान तपस्वी च्यवन ऋषि द्वारा सप्त नदियों एवं सप्त सिंधुओं के जल से समावेश कर बनाया गया इस प्राचीन सरोवर से संबंधित कई आश्चर्यजनक कहानियां इतिहास के पन्नों में समाहित है। हसुपरा से देवकुंड की दूरी 6 किलोमीटर है। पुनपुन एवं मंदार नदी के संगम पर होने के कारण यह पवित्र तीर्थ स्थल है। कहा जाता है कि पांच हजार वर्ष पूर्व कर्मनाशा नदी पार कर भगवान राम देवकुंड पहुंचे और इसी सरोवर में स्नान कर च्यवन ऋषि का दर्शन किया। उन्हीं द्वारा यहां शिवलिंग स्थापित की गई जिसकी चर्चा आनंद रामायण धार्मिक ग्रंथ में वर्णित है। पुराने कथाओं के अनुसार च्यवन ऋषि तपस्यारत थे। यहां गया शहर की स्थापना करने वाले राजर्षिगेय ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। इसमें भाग लेने गया पहुंचे ऋषि च्यवन ने उस समय ककीट देश (वर्तमान मगध) की व्यापक यात्रा की। यात्रा के दौरान ही उन्होंने सिद्घवन को पाया जो सोनभद्र व पुनपुन के बीच स्थित था। सिद्घवन यानी देवकुंड से प्रभावित च्यवन ऋषि तपस्या पर बैठ गये। काफी दिनों तक आसन पर बैठने के कारण उनका शरीर एकत्रित मिट्टी से ढक गया। इसी दौरान राजा ययाति अपनी पुत्री सुकन्या के साथ यहां पहुंचे। सुकन्या और च्यवन ऋषि ने इसी सरोवर पर छठ किया था, फलत: उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। यहां तपस्या में लीन च्यवन ऋषि का अस्वस्थ शरीर सरोवर में स्नान करने से ठीक हो गया। यहां पांच सौ वर्ष पूर्व से स्थापित अग्निकुंड की आग बुझी नहीं है। कुंड में आज भी हवन होता है। यहां शिवलिंग विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमा च्यवन ऋषि का आश्रम व कई अवशेष हैं जो अपने सुनहले अतीत के साथ न जाने कितनी कहानियां एवं पुरातात्विक अवशेष के संबंध को बया करती है। पदम पुराण, पाताल खंड, वायु पुराण, आनंद रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।