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बिहार के रामकिशुन ने पेश की मिशाल: 17 साल की उम्र से शुरू किया था मिशन, आज राहगीरों का सहारा बने सैकड़ों पेड़

Published: Wed, 08 Jul 2026 05:35 PM (IST)

अररिया के 90 वर्षीय रामकिशुन साह पिछले छह दशकों से बिना किसी प्रचार-प्रसार या सरकारी सहायता के पर्यावरण की सेवा ...और पढ़ें

90 वर्षीय रामकिशुन साह। जागरण

90 वर्षीय रामकिशुन साह। जागरण

HighLights

  1. 90 वर्षीय रामकिशुन साह 60 वर्षों से पर्यावरण की सेवा कर रहे।

  2. हजारों पेड़ लगाकर राहगीरों को छाया और फल प्रदान करते हैं।

  3. पेड़ों को संतान मानकर उनकी देखभाल करते हैं, प्रेरणास्रोत बने।

अफसर अली, अररिया। जिले के रानीगंज प्रखंड के बसैटी गांव के 90 वर्षीय रामकिशुन साह बिना किसी प्रचार-प्रसार और सरकारी सहायता के पिछले छह दशकों से पर्यावरण की सेवा में जुटे हैं।

निरक्षर होने के बावजूद उन्होंने पर्यावरण संरक्षण का जो संदेश दिया है, वह किसी पाठ्यपुस्तक से कम नहीं है। उनके लगाए हजारों पौधों में से सैकड़ों आज विशाल वृक्ष बनकर राहगीरों को छाया और फल प्रदान कर रहे हैं।

रामकिशुन साह का मानना है कि एक पौधा एक संतान के समान होता है। जैसे संतान बड़ा होकर परिवार का सहारा बनता है, वैसे ही पौधा बड़ा होकर लोगों को छाया, शुद्ध हवा और भोजन देता है। यही सोच उन्हें जीवनभर पौधारोपण के लिए प्रेरित करती रही।

17 सालों की उम्र से लगा रहे पेड़

वे बताते हैं कि जब उनकी उम्र महज 17-18 वर्ष थी, तब वे भैंस चराने जाया करते थे। उसी दौरान प्रकृति के प्रति उनके मन में गहरा लगाव पैदा हुआ। जहां कहीं आम, जामुन, इमली, बरगद, जलेबी समेत अन्य पेड़ों के छोटे-छोटे पौधे दिखाई देते, उन्हें सावधानीपूर्वक उखाड़कर सड़क किनारे, नहर की पटरी या खाली स्थानों पर रोप देते थे।

उनका एक ही उद्देश्य था कि आने वाले वर्षों में ये पौधे विशाल वृक्ष बनकर राहगीरों को छांव दें और उनके फल भूखे-प्यासे लोगों के काम आएं। रामकिशुन साह केवल पौधे लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानते थे। वे उनकी नियमित देखभाल भी करते थे। गर्मी के मौसम में दूर-दूर से पानी लाकर पौधों को सींचते, ताकि वे सूख न जाएं।

आज राहगीरों के लिए बना सुकून का सहारा 

उनकी इसी मेहनत का परिणाम है कि आज बसैटी से तमघट्टी, पहुंसरा, पोठिया, लकुंवा, मझूवा पूरब, कालाबलुवा आदि जाने वाली सड़क तथा नहर किनारे हजारों पौधे लगे हैं। उनके लगाए कई पौधे विशाल वृक्ष की सकल में आज भी लहलहा रहे हैं।

इन पेड़ों की छांव में राहगीर विश्राम करते हैं और फलदार वृक्षों के फल भी लोगों के काम आते हैं। उन्होंने अपने घर और बगीचे में भी अनेक फलदार एवं छायादार वृक्ष लगाए हैं। उनका बगीचा हरियाली से आच्छादित है।

पेड़ कटने का दुख 

ग्रामीण उन्हें एक सच्चे पर्यावरण प्रेमी के रूप में सम्मान देते हैं और उनकी प्रेरणा से कई लोग पौधारोपण के लिए आगे भी आ रहे हैं। हालांकि रामकिशुन साह को इस बात का गहरा दुख है कि वर्षों की मेहनत से तैयार किए गए कई पुराने वृक्ष वन माफियाओं द्वारा काट दिए गए।

वे भावुक होकर कहते हैं, जब कोई पेड़ कटता है तो ऐसा लगता है जैसे मेरे शरीर का कोई हिस्सा काट दिया गया हो। पेड़ को बड़ा होने में वर्षों लग जाते हैं, लेकिन उसे काटने में कुछ ही मिनट लगते हैं। आज जब जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण से पूरी दुनिया चिंतित है, तब रामकिशुन साह का जीवन समाज के लिए एक प्रेरक संदेश दे रहे है।

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