अररिया में 2 लाख लोग चचरी पुल के सहारे; उद्घाटन से पहले ढहा पड़रिया पुल 2026 में भी अधूरा! जांच के नाम पर काम भी बंद
Araria Bakra River Padariya Bridge: अररिया में बकरा नदी पर बना पड़रिया पुल जून 2024 में उद्घाटन से पहले ही ...और पढ़ें

Araria Bakra River Padariya Bridge: अररिया में बकरा नदी पर पुल निर्माण अधर में
HighLights
पड़रिया पुल जून 2024 में उद्घाटन से पहले ही ढह गया।
दो लाख लोग खतरनाक चचरी पुल और नावों से यात्रा कर रहे।
जांच के बावजूद पुनर्निर्माण कार्य पूरी तरह से रुका हुआ है।
संवाद सूत्र, सिकटी (अररिया)। Araria Bakra River Padariya Bridge: अररिया-किशनगंज सीमा को जोड़ने वाली बकरा नदी के पड़रिया घाट पर बहुप्रतीक्षित पुल के पुनर्निर्माण की कवायद पूरी तरह अधर में लटकी हुई है। विगत 18 जून 2024 को उद्घाटन से ठीक पहले पहली मानसूनी बारिश में ताश के पत्तों की तरह ढहे इस पुल का मलबा आज भी व्यवस्था की विफलता की गवाही दे रहा है।
हादसे के बाद विभागीय स्तर पर दिल्ली और हैदराबाद की उच्चस्तरीय विशेषज्ञ जांच टीमों का दौरा हुआ, जिन्होंने जल्द काम शुरू करने का भरोसा दिया था। हालांकि, साल 2026 बीतने को है लेकिन धरातल पर निर्माण की एक ईंट भी नहीं रखी जा सकी। जांच फाइलों में सिमटने के कारण इलाके के करीब दो लाख लोग रोजमर्रा की आवाजाही के लिए नारकीय स्थिति झेल रहे हैं।
इस पुल के न बनने से सिकटी, कुर्साकांटा, फारबिसगंज और पलासी प्रखंड के दर्जनों गांवों का सीधा संपर्क कटा हुआ है। हाल ही में बकरा नदी के जलस्तर में हुई अप्रत्याशित वृद्धि से ग्रामीणों द्वारा बनाया गया चचरी पुल भी तेज बहाव में बह गया।
अब तीरा खारदह, पड़रिया, नेमुआ पीपरा, ढेगरी, मसुंडा, भिड़भिड़ी, बरदाहा और डेढ़ुआ गांव के लोगों के पास जान जोखिम में डालकर छोटी नावों से नदी पार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
दैनिक जरूरत के सामान लाने हों या फिर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं, ग्रामीणों को मीलों का चक्कर काटकर फारबिसगंज जाना पड़ रहा है। 2026 में भी पुल चालू होने का सपना टूट चुका है और अब क्षेत्रवासियों की उम्मीदें 2027 पर जा टिकी हैं।
धारा बदलने के साथ बढ़ती गई लंबाई
पड़रिया घाट पर पुल निर्माण की कहानी तकनीकी अदूरदर्शिता और विभागीय लापरवाही की मिसाल है। वर्ष 2011 में पुल निर्माण निगम ने 11 करोड़ रुपये की लागत से चार पायों के पुल की मंजूरी दी थी। अभी तीन पाये ही बने थे कि बकरा नदी अपनी धारा बदलकर पूरब की ओर खिसक गई।
इसके बाद वर्ष 2018 में अधिकारियों के निरीक्षण के बाद 12 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि स्वीकृत की गई और पहले पुल से सटाकर चार और पाये बनाए गए, जो जून 2019 में पूरे हुए।
खर्च हुए 31 करोड़
एप्रोच पथ का निर्माण शुरू होता, इससे पहले ही नदी पूरब को छोड़ पश्चिम दिशा की ओर रुख कर गई और बना बनाया पुल सूखी जमीन पर खड़ा नजर आने लगा। इसके बाद स्थानीय विधायक विजय कुमार मंडल की पहल पर ग्रामीण कार्य विभाग (आरईओ) ने लगभग 7.79 से 8 करोड़ रुपये की लागत से 182.65 मीटर लंबे हिस्से की स्वीकृति दी। इस तरह तीन चरणों में लगभग 31 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की गई।
सुरक्षित पायों और टूटे हिस्से के बीच 200 मीटर की खाई
हैरत की बात यह है कि पहले और दूसरे चरण में बने आठ पाये आज भी नदी किनारे पूरी तरह सुरक्षित खड़े हैं। आरईओ द्वारा बनाए गए तीसरे हिस्से का काम 2023 के अंत में पूरा हुआ था। तकनीकी योजना के अनुसार नदी की धारा को मोड़ने, गाइड बांध बनाने, एप्रोच पथ तैयार करने, दोनों हिस्सों के बीच बैरिकेडिंग और बोल्डर पिचिंग का काम होना बाकी था।
लेकिन इससे पहले कि 200 मीटर के फासले पर मिट्टी भराई पूरी होती, जून 2024 में नवनिर्मित हिस्सा नदी के गर्भ में समा गया। उस वक्त मजदूर स्थल पर मौजूद नहीं थे, जिससे बड़ा जानी नुकसान टल गया था।
पड़रिया पुल: निर्माण और बर्बादी की टाइमलाइन
पहला चरण (2011): पुल निर्माण निगम ने 11 करोड़ की लागत से 4 पायों का निर्माण शुरू किया; 3 पाये बनते ही नदी पूरब खिसकी।
दूसरा चरण (2018–2019): धारा बदलने पर 12 करोड़ की लागत से 4 और पाये जोड़कर जून 2019 में तैयार किए गए (कुल 8 सुरक्षित पाये)।
तीसरा चरण (आरईओ): नदी पश्चिम मुड़ी तो लगभग 7.79 से 8 करोड़ की लागत से 182.65 मीटर अतिरिक्त पुल बना; 2023 में काम पूरा हुआ।
हादसा (18 जून 2024): उद्घाटन और एप्रोच पथ बनने से पहले ही पहली मानसूनी बारिश में तीसरा हिस्सा ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
वर्तमान स्थिति: सुरक्षित 8 पायों और ढहे हिस्से के बीच 200 मीटर का फासला; एप्रोच, बोल्डर-पिचिंग और पुनर्निर्माण अधर में।
ग्रामीणों का आरोप है कि गुणवत्ता की अनदेखी और कमीशनखोरी के कारण यह पुल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा। जांच के नाम पर दो साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी न तो ठेकेदार और जिम्मेदार अभियंताओं पर कोई निर्णायक कार्रवाई सामने आई और न ही नए सिरे से टेंडर जारी कर काम शुरू कराया गया। जनता आज भी बकरा नदी के किनारे खड़े होकर सिर्फ यही सवाल पूछ रही है कि आखिर उनकी यह जोखिम भरी यात्रा कब खत्म होगी।
