असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीक से संभव होता संतान सुख

हर दंपत्ति के जीवन में संतान का सुख बहुत महत्वपूर्ण होता है। पति-पत्नी से माता-पिता बनने की ओर बढ़ाया हुआ कदम एक नए रोमांचक सफर की शुरुआत करता है। प्रकृति ने बड़ी ख़ूबसूरती से पुरुष और महिला के शरीर की सरंचना की है जिससे वह एक नए जीवन को जन्म दे सके। गर्भधारण के लिए जरूरी है की आप शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आपको तैयार रखे। इस लेख के माध्यम से सफलतापूर्व गर्भधारण करने के लिए क्या करें और क्या न करने वाले तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है।

कुछ दम्पत्तियों के लिए गर्भधारण करना काफी आसान होता है जबकि कुछ को इस सफर में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता। जब आप गर्भधारण के लिए प्रयास कर रहे हो तो इन बातो पर ध्यान अवश्य दें:

ओवुलेशन के समय को सही से आंकना

आपके ओवुलेशन के समय से 5 दिन पूर्व एवं बाद में असुरक्षित रूप से शारीरिक संबंध बनाना आपकी गर्भधान के सम्भावनाओं को काफी बढ़ा सकता है। ओवुलेशन प्रक्रिया में स्त्री के अंडाशय से विकसित अंडा निकल कर फेलोपियन ट्यूब में आ जाता है ताकि वह शुक्रणुओं के संपर्क में आकर निषेचित हो सके। अंडाशय से निकलने के बाद अंडा अगले 12 से 24 घंटो तक निषेचन कर सकता है इसलिए गर्भधारण हेतु इस दौरान शुक्राणुओं का महिला के शरीर में होना आवश्यक है। सही परिस्थितियों में शुक्राणु 5 दिन तक महिला के शरीर में जीवित रह सकते है इसलिए ओव्यूलेशन के समय पर निरंतर शारीरिक संबंध गर्भधारण के लिए कारगर साबित हो सकता है।

महिलाओं का माहवारी चक्र 28 दिन में दोहराता है। आमतौर पर अगले मासिक धर्म की शुरुआत के लगभग 14 दिनों पहले ओव्यूलेशन होता है। ज्यादातर महिलाओं में मासिक धर्मचक्र के मध्य बिंदु से पहले या बाद के 4 दिनों में ओव्यूलेशन हो सकता है। अगर आपके मासिक धर्म का चक्र 28 दिन में पूर्ण नहीं होता है तो आप ओव्यूलेशन कैलेंडर की मदद से मासिक चक्रो के बीच के लम्बाई और ओवुलेशन का मध्य बिंदु पता कर सकती है।

कैलेंडर के अलावा आप इन लक्षणों पर ध्यान देकर भी ओव्यूलेशन के समय का पता लगा सकते है

योनि स्त्राव में बदलाव आना: ओव्यूलेशन से पहले आप साफ़, गीले और लचीले योनि स्राव में वृद्धि देख सकते हैं। ओव्यूलेशन के एकदम बाद गर्भाशय म्यूकस कम और गाढ़ा हो जाता है जिसका आसानी से देखा नहीं जा सकता।

शरीर के बेसल तापमान में बदलाव : ओव्यूलेशन के दौरान महिला के शरीर का तापमान बाकी शरीर की तुलना में थोड़ा से बढ़ जाता है। विशेष तौर से बेसल तापमान नापने वाले थर्मामीटर की मदद से आप हर सुबह अपने शरीर का बेसल तापमान नाप सकती है और इन आंकणो की मदद से आप ओव्यूलेशन पैटर्न का पता लगा सगती है। बेसल तापमान बढ़ने के 2-3 दिन पहले महिला की प्रजनन क्षमताएं उच्च स्तर पर होती है।

आप ओव्यूलेशन किट के माध्यम से भी यूरिन की जांच द्वारा उन हॉर्मोन का पता लगा सकती है जो ओव्यूलेशन से पहले स्त्रावित होते है जिससे आप गर्भधारण के लिए ओव्यूलेशन का सबसे अच्छा समय आंक सके।

क्या करें

गर्भवती होने के लिए आप इन सरल युक्तियों का पालन कर सकती है

•नियमित रूप से शारीरिक संबंध बनाना: गर्भावस्था की उच्चतम दर उन जोड़ों में देखी गयी है जो नियमित रूप से यौन संबंध बनाते हैं।

•ओवुलेशन के दौरान शारीरिक संबंध बनाना: अगर नियमित रूप से सहवास कर पाना संभव नहीं हो तो आपके मासिक चक्र के पूर्ण होने के 1 हफ्ते बाद 2-3 दिन तक शारीरिक संबंध बना कर गर्भधारण की सम्भावनाएँ बढाई जा सकती है।

•सामान्य शारीरिक वज़न बनाये रखना : देखा गया है की जिन महिलाओं का वज़न ज्यादा या काम होता है, उन्हें गर्भधारण करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। अनुचित वज़न का महिला के स्वस्थ्य एवं ओव्यूलेशन चक्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है जिसके चलते उन्हें गर्भधारण में परेशानी आ सकती है। इसी के साथ आपके स्वस्थ्य का सीधा असर आपके होने वाले बच्चे के स्वस्थ्य पर भी पड़ सकता है इसीलिए शारीरिक सेहत पर ध्यान देना गर्भधारण के पूर्व एवं दौरान काफी जरुरी है।

क्या ना करें

गर्भधारण के लिए इन चीजों के सेवन से बचे

•धूम्रपान न करे : तम्बाकू सेवन आपकी प्रजनन क्षमताओं पर कई नकारात्मक प्रभाव डालता है जिसका महिला और उसकी गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। जरुरी है की आप गर्भधारण करने से पहले सिगरेट एवं तम्बाकू का सेवन बिलकुल बंद कर दें।

•भारी मात्रा में शराब सेवन प्रजनन क्षमता को काम करता है। गर्भधारण और अपने एवं शिशु के अच्छे स्वास्थ्य के लिए शराब सेवन से बचे।

•कैफीन का सेवन कम करे: अगर आप कॉफी का निरंतर रूप से सेवन करते है तो आपको इसकी मात्रा पर ध्यान देना होगा। २०० मिलीग्राम (१ से २ कप कॉफ़ी) से ज्यादा कैफीन का हर दिन सेवन प्रजनन क्षमताओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

•भारी व्यायाम से बचे : वैसे तो व्यायाम अच्छे स्वास्थ्य के लोए जरुरी होता है लेकिन जरुरत से ज्यादा और कठिन व्यायाम आपके ओव्यूलेशन चक्र को प्रभावित कर सकता है जिससे गर्भधारण करने में दिक्कत आ सकती है।

कब चिकित्सक का परामर्श है जरूरी ?

आमतौर पर असुरक्षित रूप से यौन संबंध द्वारा एक स्वस्थ दंपत्ति को गर्भधारण करने में 1 वर्ष तक का समय लग सकता है। अगर आपकी उम्र ३५ वर्ष से कम है और आपकी एवं आपके साथी को स्वास्थ्य संबंधी कोई दिक्कत नहीं है तो गर्भधारण के लिए चिकित्सीय उपचार लेने से पहले १ वर्ष तक कोशिश करने की सलाह दी जाती है। ३५ का पड़ाव पार करने के बाद या किसी चिकित्सिकीय कारण या रोग की वजह से आप गर्भधारण नहीं कर पा रहे है तो डॉक्टर के राय लेने में देर नहीं करनी चाहिए।

निःसंतानता पुरुष और महिला दोनों को प्रभावित करती है। काफी समय तक निःसंतानता की वजह केवल महिलाओ को माना गया है। विज्ञान और चिकित्सा तकनीक में विकास के साथ यह तथ्य उजागर हुआ है की निसंतानता की लिए पुरुष और महिलाएं बराबर जिम्मेदार हो सकते है।

भारत में 6 में से 1 दंपत्ति निःसंतानता का दंश झेल रहा है। लोगो में आम धरना है की निःसंतानता का इलाज काफी मुश्किल एवं महंगा होता है। असल में यह तथ्य बिलकुल गलत है। निसंतानता की कई कारण हो सकते है जिसके परिणामस्वरूप इसका इलाज के भी कई तरीको द्वारा करना संभव है।

निःसंतानता की इलाज शुरू करने से पहले विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा आपकी और आपकी साथी के प्रजनन तंत्र की गहन जांच करना जरुरी है ताकि परेशानी की जड़ का पता लगाया जा सके। निःसंतानता के करक को ध्यान में रखकर ही इलाज का परामर्श दिया जाता है।

कई मामलो में दवाइयों एवं जीवन शैली में बदलाव करके भी संतान सुख की प्राप्ति की जा सकती है। महिला की फेलोपियन ट्यूब का बंद होना या पुरुष में इरेक्टाइल डिसफंक्शन जैसे मामलो में शल्यचिकित्सा द्वारा निःसंतानता का इलाज संभव हो पता है।

असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीक के द्वारा भी गर्भधारण में आने वाली समस्याओं को दूर किया जा सकता है। इस तकनीक के इस्तेमाल द्वारा विषम परिस्थितियों में भी दंपत्ति संतान प्राप्ति का स्वप्न पूरा करने में सफल हो रहे है। असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीक में गर्भधारण हेतु मुख्य रूप से आईवीएफ, आईयूआई एवं आईसीएसआई प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी जाती है।

आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) - आईवीएफ प्रक्रिया में शरीर के बाहर पुरुष के शुक्राणु और महिला के अंडाणु के बीच निषेचन (फर्टिलाइजेशन) कराया जाता हैं। यह प्रक्रिया प्राकृतिक तौर पर महिला के फैलोपियन ट्यूब में पूर्ण होती हैं। एम्ब्रियोलॉजी लैब में तैयार किये गए भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है जिसके बाद से गर्भधान से शिशु के जन्म तक की पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से ही पूरी होती हैं, चूंकि महज भ्रूण तैयार करने की प्रक्रिया शरीर के बाहर लैब में टेस्ट ट्यूब के अन्दर होती है इसलिए इसे टेस्ट ट्यूब बेबी के नाम से भी जाना जाता है।

आईसीएसआई (इक्सी) - आईवीएफ प्रक्रिया में लैब में महिला के अण्डों को पुरुष के शुक्राणुओं के संपर्क में लाया जाता है ।। कुछ स्थितियों, जैसे न्यून शुक्राणु संख्या या गतिशीलता, में इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन का उपयोग करके एक स्वस्थ शुक्राणु को महिला के अंडे के भीतर छोड़ दिया जाता है जिससे भ्रूण पैदा हो सके।

आईयूआई - प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर पाने पर डॉक्टर कई बार आईयूआई की सलाह देते है जिसमे पुरुष के शुक्राणुओ को साफ़ करके कृत्रिम तरीके से सीधा महिला के गर्भाशय में इंजेक्ट कर दिया जाता है। जो पुरुष आमतौर पर वीर्य उत्सर्जित नहीं कर पाते या जिनके शुक्राणुओं की संख्या एवं गुणवत्ता में कमी पायी जाती है उन्हें इस तकनीक को अपनाने की सलाह दी जाती है। महिला में सर्विक्स संबंधी समस्या में भी यह तकनीक गर्भधारण करने में कारगर साबित हुई हैं।

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Posted By: Tilak Raj