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काल नहीं है बीतता बीत रहे हम लोग

Publish Date:Mon, 20 Mar 2017 01:10 PM (IST) | Updated Date:Mon, 20 Mar 2017 03:48 PM (IST)
काल नहीं है बीतता बीत रहे हम लोगकाल नहीं है बीतता बीत रहे हम लोग
मर्मस्पर्शी शब्दों और सरल भाषा में रचे उनके गीत आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्नोत हैं...

खुशी-गम, जीवन-मरण, संघर्ष-निर्णय। जीवन के हर क्षण, हर भाव-भूमि पर गोपालदास नीरज की कविताएं, गीत, गीतिकाएं, मुक्तक उपलब्ध हैं। 

समय के साथ शतायु होने की दहलीज पर पहुंच चुके गोपालदास नीरज आज भी मंच पर किसी युवा की तरह अपने गीत और गीतिकाएं प्रस्तुत करते हैं। वे अपनी प्रभावपूर्ण आवाज में कहते हैं कि मुश्किलें हमराह के लिए आशीष के समान हैं, जिसने मुश्किलों से मुकाबला नहीं किया, उससे संघर्ष नहीं किया, कभी अपना लक्ष्य नहीं पा सका। लेखनी आंसुओं की स्याही में डुबाकर लिखो दर्द को प्यार से सिरहाने बिठाकर रखो। जिंदगी कमरों-किताबों में नहीं मिलती धूप में जाओ पसीने में नहाकर देखो।

मेहनतकश बचपन
गोपालदास नीरज इन दिनों घर में सिर्फ सहायकों के साथ रहते हैं। आंखों में तकलीफ की वजह से वे बहुत अधिक पढ़ नहीं पाते। कविताएं भी लिख नहीं पाते हैं। हंसते हुए बताते हैं कि पुरानी कविताएं ही सुनाता रहता हूं। मेरी याद्दाश्त अभी भी अच्छी है। एक बार जो लिख लेता हूं, वह हमेशा के लिए याद हो जाती है। बचपन के दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं, ‘मेरी यात्रा बहुत संघर्षपूर्ण रही है। बचपन बेहद कष्टप्रद रहा। छह वर्ष की उम्र में ही पिताजी की मृत्यु हो गई। बुआ के यहां (एटा) रहकर मैंने हाईस्कूल पास किया। इसके बाद पढ़ाई करने के लिए पैसे मिलने बंद हो गए। मुझे नौकरी तलाशने को कहा गया। मैंने न सिर्फ ट्यूशन पढ़ाया और टाइपिंग का काम किया, बल्कि तांगा चलाकर भी पैसे कमाए। मैंने किसी भी काम को कभी छोटा नहीं समझा। हमेशा मेहनत के साथ काम किया।’

अधिक प्रसिद्धि की चाह नहीं
नीरज ने कभी लोकप्रियता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। सिनेमा जगत में जब उनकी प्रसिद्धि चरम पर थी, तो वे सोचने लगे कि सुविधाएं तो इंसान को कमजोर कर देती हैं और मुंबई से वापस अपने घर अलीगढ़ आ गए। उन्हें लगा कि जो पाना था सो पा लिया अब आगे क्या करना है, तो उन्होंने हाइकू लिखना शुरू कर दिया। हाइकू जापानी काव्य-विधा है। मात्र तीन पंक्तियों की यह कविता किसी सूक्ति के समान प्रभाव उत्पन्न करती है। बातों-बातों में नीरज तीन हाइकू भी सुना देते हैं। दहेज प्रथा/लड़की के पिता की/करुण कथा। वे हैं अकेले/ दूर खड़े होकर/ देख रहे मेले। वो है निराला/ जिसने पिया/ विष का प्याला। इस प्रकार वे अब तक सौ से भी अधिक हाइकू लिख चुके हैं।

अब गाकर नहीं पढ़ते कविताएं
इन दिनों वे अपने घर से न के बराबर निकलते हैं। अखबार पढ़ते-देखते ही शाम तक का समय निकाल लेते हैं। अब वे किसी कवि सम्मेलन या कार्यक्रम में भी जाना नहीं चाहते हैं लेकिन उनकी कविताओं के दीवाने युवा भी हैं। इसलिए प्रशंसक उन्हें जबर्दस्ती ले जाते हैं। वे कहते हैं, ‘लय-ताल के साथ गाकर मैं कविताएं अब पढ़ नहीं पाता हूं। जो याद हैं उन्हें बोलकर कार्यक्रम में सुना देता हूं।’ फौलाद की मूरत भी पिघल सकती है पत्थर से भी मिट्टी निकल सकती है। इंसान यदि अपनी पर आ जाए तो, कैसी भी हो तकदीर बदल सकती है।

समय ही आत्मा है
नीरज ईश्वर को नहीं मानते हैं लेकिन इन दिनों वे अध्यात्म में विश्वास करने लगे हैं। वे जोर देकर कहते हैं, ‘आंतरिक जीवन का अध्ययन ही अध्यात्म है। सभी कर्मकांड पंडितों द्वारा रचे गए हैं। न पुनर्जन्म है और न स्वर्गनरक। न ही ईश्वर है। ये सभी भ्रम हैं। गीता कहती है नैनं छिंदति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक:। शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि जला नहीं सकती, ये तो आत्मा का गुण है। संसार में देश और काल ही प्रमुख है। दरअसल, समय ही आत्मा है, जिसे न कोई काट सकता है और न ही मार सकता है। यह अखंड है।’ काल नहीं है बीतता बीत रहे हम लोग। भोग नहीं हम भोगते भोग रहा हमें भोग। वे आगे बताते हैं, ‘पंतजी कहा करते थे कि ये सभी मनुष्य द्वारा निर्मित प्रपंच हैं। लोगों ने अगम्य को भी गम्य बना डाला। छोटा बच्चा किस तरह बढ़ता है, यह कोई नहीं देख पाता है। हर क्षण आप बदल रहे हैं लेकिन उस बदलाव को देख नहीं पा रहे हैं। सिर्फ महसूस कर पा रहे हैं। जैसे सर्प के निशान दिखाई देते हैं, उसी तरह वक्त के सिर्फ निशान दिखाई देते हैं। हॉकिंस सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं। वे भी कहते हैं कि ईश्वर नहीं हैं, जो भी है, वह समय है।

लंबी आयु का राज
भले ही नीरज 94 से अधिक उम्र के हो गए हों लेकिन जिंदगी के प्रति उनका हौसला अनुकरणीय है। वे कहते हैं, ‘जब मृत्यु को आना होगा, तो वह आएगी जरूर। उससे डर कैसा? मैं अपने शरीर की देखभाल खुद करता हूं। उसका इलाज स्वयं करता हूं। मुझे जिस करवट सोने में दिक्कत होती है, उस ओर सोना ही छोड़ दिया। जो लोग अपना लगातार अध्ययन करते रहते हैं, अपने ऊपर लगातार शोध करते रहते हैं, वे ही लंबी उम्र तक जीते हैं। जो लोग सामान्य जीवन जीते हैं और दस की बजाए एक रोटी खाते हैं, वे मेरी तरह लंबी आयु पाते हैं।’ नीरज का दिमाग और दिल दोनों तंदुरुस्त है। उन्हें आज भी टेलीफोन नंबर याद रहते हैं। मुंबई में बिताए दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘कारवां गुजर गया’, ‘रंगीला रे तेरे रंग में’ जैसे मेरे कई गानें फिल्मों में हिट हुए। उन गीतों की रॉयल्टी मुझे आज तक मिलती है। कई मशहूर संगीतकारों के साथ मैंने काम किया। धीरे-धीरे मेरे साथ काम करने वाले कई लोग जैसे कि एस.डी. बर्मन, राज कपूर आदि की मौत हो गई। इससे मेरा मन टूट गया। फिर रास नहीं आई मुंबई और मैं अलीगढ़ लौट आया।’

जीवन के प्रति आसक्ति
‘युवा मुझसे ज्यादा अच्छा लिख रहे हैं, फिर वे मेरी तरह क्यों लिखें?’ सवाल पूछते हैं नीरज। वे आगे कहते हैं कि युवाओं को मेरी तरह नहीं लिखना चाहिए। समय के साथ और अच्छे लोगों को सामने आना चाहिए। मैंने राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय गीतों के अलावा इमरजेंसी पर भी लिखा।’ बीड़ी पीने की गलत आदत के बारे में हंसते हुए कहते हैं, ‘सभी एक-एक कर छोड़ते चले गए लेकिन इसने अब तक नहीं छोड़ा। जीवन जीने के लिए कुछ तो आसक्ति चाहिए। अब यही आसक्ति मजबूरी बन गई है!’
-स्मिता

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