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मौसम की बेरूखी ने छीनी बागवानों की नींद व चैन

जमुई। बासुकी ¨सह अपने बाग में कभी पेड़ों को निहारता है तो कभी जमीन पर गिरे आम के टिकोलों को।

By JagranEdited By: Published: Thu, 27 Apr 2017 03:01 AM (IST)Updated: Thu, 27 Apr 2017 03:01 AM (IST)
मौसम की बेरूखी ने छीनी बागवानों की नींद व चैन
मौसम की बेरूखी ने छीनी बागवानों की नींद व चैन

जमुई। बासुकी ¨सह अपने बाग में कभी पेड़ों को निहारता है तो कभी जमीन पर गिरे आम के टिकोलों को। उसके चेहरे पर ¨चता की गहरी लकीर दिखती है। अनायास वह बुदबुदा उठता है, हे भगवान इस बार पूंजी भी वापस नहीं होगी। इस मनोस्थिति में सोनो प्रखंड के बासुकी ¨सह अकेले नहीं हैं, बल्कि जिले के लगभग सभी बागवानों का यही हाल है। मौसम की बेरूखी ने बागवानों का चैन व नींद छीन लिया है। दरअसल जिले में अप्रैल में भी मौसम का उतार-चढ़ाव जारी है। दो दिन तेज पछुआ हवा चलती है तो फिर पूर्वा हवा के साथ तापमान में गिरावट आ जाती है। बागवानों के मुताबिक इस दौरान तेजी से टिकोले पेड़ों से गिरते रहे हैं।

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बागवान मो. शमीम ने बताया कि 550 पेड़ के बाग में 50 फीसद से अधिक टिकोले गिर गए। अन्य बागवान मो. अयुब, मुन्ना राम, महेंद्र साव, मो. शमीम ने ऐसा ही कुछ बताया। बरहट प्रखंड के डाढ़ा निवासी ज्ञानेंद्र कुमार ¨सह ने बताया कि लगभग डेढ सौ पेड़ के उसके बाग में बहुत कम टिकोले बच सके हैं। पछुआ हवा के दौरान पेड़ में पटवन भी किया गया। बता दें कि वैसे जिले में व्यवसायिक स्तर पर आम की कोई खास खेती नहीं होती है। लोग अपने जरूरत के हिसाब से बाग लगाते हैं।

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कहते हैं कृषि वैज्ञानिक

कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ¨सह ने बताया कि पछुआ हवा से टिकोले गिरते हैं मगर इससे मधुआ रोग का प्रकोप कम होता है। खेत की ¨सचाई कर पछुआ हवा से तथा डाइमेथोयेट 2 एमएल प्रतिलीटर का छिड़काव कर मधुआ रोग से बचा जा सकता है। उन्होंने बताया कि मौसम के उतार-चढ़ाव से टिकोला गिरने का कोई प्रमाणिक वैज्ञानिक कारण नहीं है। टिकोला गिरना आम प्रक्रिया है। मंजर के 0.5 फीसद ही आम तैयार होता है।

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कहते हैं जिला उद्यान पदाधिकारी

जिला उद्यान पदाधिकारी वेद प्रकाश ने कहा कि एक साल अच्छा मंजर, दूसरे साल कम मंजर आना पेड़ की प्रवृति होती है। इस साल मंजर के अनुपात में आम पेड़ पर नहीं लग सके।


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