लंदन [प्रेट्र]। विज्ञान ने तरक्की के साथ हमारे जीवन को आसान बनाने में अहम योगदान दिया है। एक छोटे सी कम्यूनिकेशन डिवाइस मोबाइल फोन से कहीं से भी चंद सेकेंड में कई काम किए जा सकते हैं। इतनी सुविधा के बीच सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि हम हमेशा एक अनजान डर से घिरे रहते हैं। कहीं कोई हमारे मोबाइल फोन में सेंध लगाकर हमारा निजी डाटा चुरा न ले। कहीं फोन के जरिये कोई हमारे बैंक अकाउंट में हेर-फेर न कर दे। इस डर को खत्म करने के लिए हैकरों की गतिविधियों पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है। इस प्रयास में वैज्ञानिक निरंतर लगे रहते हैं। अब इस दिशा में उन्हें एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है।

दरअसल, वैज्ञानिकों ने पहला अल्ट्रासाउंड-फायरवॉल विकसित कर लिया है, जो स्मार्टफोनों के बीच डाटा की अदला-बदली के दौरान हैकरों को उनके मंसूबों में कामयाब होने से रोकेगा। मोबाइल उपकरणों की वर्तमान स्थायी नेटवर्किंग उपभोक्ताओं की निजता को खतरे में डाल सकती है। दरअसल, वर्तमान में नई टेक्नोलॉजी के तहत गूगल नियरबाय और सिल्वरपुश लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन में सूचना की अदला-बदली के लिए अल्ट्रासोनिक ध्वनियों का इस्तेमाल करते हैं। हमारे ज्यादातर उपकरण इस संचार चैनल के माध्यम से संवाद करते हैं। दरअसल, अल्ट्रासाउंड कम्यूनिकेशन दो डिवाइसों में सूचना की अदला-बदली के लिए उन्हें पेयर कर देता है।

यह माध्यम वेब पर कुकीज की तरह कई उपकरणों पर उपयोगकर्ताओं और उनके व्यवहार को ट्रैक करने में हैकरों के काम आता है। लगभग सभी उपकरण जिनमें माइक्रोफोन और लाउडस्पीकर होता है, वे अल्ट्रासोनिक ध्वनियां भेजते और प्राप्त करते हैं। उपभोक्ताओं को पता नहीं होता कि इन ध्वनियों में कुछ छिपा डाटा भी ट्रांसफर होता है। इस पर हैकरों की नजर रहती है।

कम नहीं थी चुनौती

इस प्रोजेक्ट के प्रमुख मैथियस, जेप्पेलजौयर के मुताबिक, एप के विकास का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा एक ऐसी विधि तैयार करना था जो अलगअलग अल्ट्रासाउंड-ट्रांसमिशन तकनीकों को विश्वसनीय और वास्तविक समय में पहचान सके। इस तरह के अल्ट्रासोनिक सिग्नल का इस्तेमाल तथाकथित क्रॉस-डिवाइस ट्रैकिंग के लिए किया जा सकता है। यह कई उपकरणों में उपभोक्ता के व्यवहार को ट्रैक करना संभव बनाता है। साथ ही कई उपभोक्ताओं की प्रोफाइल को मर्ज भी कर देता है। इस तरह सही यूजर प्रोफाइल की पहचान करना और उसे ही सुरक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती थी।

मैथियस बताते हैं, इसके लिए सबसे पहले हमने उन ध्वनियों को अलग किया और फिर केवल उस यूजर प्रोफाइल की पहचान की जिसे सुरक्षित करना था। इसके बाद इस एप के जरिये उस डिवाइस के यूजर को ध्वनियों के आदान-प्रदान पर संदेश भेजने की व्यवस्था की। इस संदेश में यूजर को पता चलता है कि कौन सी जानकारी ध्वनि के साथ निकल रही है। इसके बाद वह चाहे तो इसे रोक सकता है या चाहे तो इन जानकारियों को फिल्टर कर सकता है।

उपभोक्ताओं को करता है सचेत

उपभोक्ताओं को इससे बचाने के लिए ऑस्ट्रिया की सेंट पोल्टेन यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंसेज के शोधकर्ताओं ने एक मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किया है। यह एप्लिकेशन न केवल ध्वनि कुकीज का पता लगाता है, बल्कि उन्हें उपभोक्ताओं के ध्यान में लाता है। यदि उपभोक्ता चाहे तो इन कुकीज को रोककर ट्रैकिंग को बंद कर सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह अपनी तरह का पहला एप्लिकेशन है, जो स्मार्टफोन और टैबलेट में अल्ट्रासाउंड फायरवॉल का काम करता है। 

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