नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। ब्रेग्जिट पर डेविड कैमरन और थेरेसा मे की प्रधानमंत्री कुर्सी जाने के बाद अब बोरिस जॉनसन पर भी यही तलवार लटकी है। यह तलवार सिर्फ उनपर ही नहीं बल्कि ब्रेग्जिट पर भी लटकी है। यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने की समय सीमा मार्च 2019 के बाद बार-बार बढ़ाई गई है। इस बार भी 31 अक्‍टूबर 2019 से बढ़ाकर इसको 31 जनवरी 2020 कर दिया गया है। लेकिन तब तक भी इसमें सफलता मिल सकेगी यह कहपाना फिलहाल सभी के लिए मुश्किल हो रहा है। ब्रिटेन के निकलने के बाद यूरोपीय संघ में 27 सदस्य ही रह जाएंगे। 

ब्रेग्जिट के कड़े समर्थन रहे प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन लगातार संसद के निचले सदन को इस बाबत मनाने में असफल होते रहे हैं। वहीं अब उन्‍होंने आम चुनाव कराने पर संसद को अपने पक्ष में जरूर कर लिया है, लेकिन जानकार मानते हैं कि उनके लिए यह फैसला आसान तो किसी भी सूरत से नहीं होगा। इस प्रस्‍ताव को 20 के मुकाबले 438 मतों से पास कर दिया गया। अब दिसंबर 2019 में देश में आम चुनाव होंगे। इससे पहले ब्रिटेन में 1923 में इस मौसम में चुनाव हुए थे।

आपको बता दें कि ईयू से बाहर होने के लिए 2016 में जनमत संग्रह कराया गया था, जिसमें करीब 52 फीसद लोगों ने इसमें सहमति जताई थी। इसके बाद डेविड कैमरन ने इस्‍तीफा दे दिया था। लेकिन, तब से लेकर अब तक ब्रेग्जिट को लेकर देश की संसद और ईयू में आम सहमति नहीं बन सकी है। इसकी वजह से ब्रिटेन के आम लोग नाराज हैं। जॉनसन का कहना है कि यह वक्‍त देश को एकजुट करने का है। उन्‍हें इस बात की उम्‍मीद है कि आम चुनाव का फैसला उनके पक्ष में आएगा जिसके बाद ब्रेग्जिट पर डील को लेकर दबाव बनाना आसान हो जाएगा। लेकिन वहीं दूसरी तरफ उनके प्रतिद्वंदी और लेबर पार्टी के जेरेमी कॉर्बिन चाहते हैं कि ब्रेग्जिट को लेकर एक बार‍ फिर से जनमत संग्रह कराया जाए। इस लिहाज से 12 और 13 दिसंबर का दिन बेहद खास है। 12 को जहां चुनाव होगा वहीं 13 को इसके नतीजे सामने आ जाएंगे। 

लेकिन यहां पर बड़ा सवाल ये है कि यदि नतीजे किसी भी पार्टी के पक्ष में नहीं गए तो फिर क्‍या होगा। ऐसे में जाहिरतौर पर ब्रेग्जिट का भविष्‍य अधर में लटक जाएगा। यह स्थिति भावी पीएम के लिए मुश्किल होगा। इस चुनाव में ब्रेग्जिट के अलावा कई स्‍थानीय मुद्दे भी हैं जो अहम भूमिका निभाने वाले हैं। कॉर्बिन लगातार सार्वजनिक सेवाओं के लिए धनाढ्य वर्ग पर अधिक कर लगाने का समर्थन करते आए हैं। इसके अलावा वो ऊर्जा कंपनियों का राष्‍ट्रीयकरण भी करना चाहते हैं। आपको यहां पर ये भी बता दें कि थेरेसा मे ने भी इसी तरह से चुनाव कराने का दांव खेला था लेकिन उन्‍हें पूर्ण समर्थन न मिलने की वजह से उन्‍हें इस्‍तीफा देना पड़ा था। इतना ही नहीं इस हार से उनका राजनीतिक करियर भी खराब हो गया। 

इस आम चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने कमर कस ली है। लेबर और कंजरवेटिव के सामने ब्रेग्जिट पार्टी भी कम परेशानी वाली नहीं है। वहीं लिबरल डेमोक्रेट्स लगातार ब्रेग्जिट का विरोध करने वालों को साधने की कोशिश कर रही है। चुनाव घोषणा के साथ ही इसको लेकर सर्वे भी शुरू हो गए हैं। एक सर्वे में कंजर्वेटिव पार्टी को लेबर पार्टी के मुकाबले 10 फीसदी आगे दिखाया गया है। लेकिन जानकार इस सर्वे के मॉडल पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं।

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Posted By: Kamal Verma

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