लंदन, एजेंसीडॉक्टरों ने 23 हफ्तों की गर्भावस्था के बाद जन्मे एक बच्चे के बारे में कहा है यह लाखों में से एक मामला है, जिसमें नवजात की जान बचती है। एक सुई के आकार में जन्मे इस बच्चे का वजन 700 ग्राम था। देखभाल कर्मी हैना रोज (25) और उसके 27 वर्षीय पार्टनर डेनियल बोन्स को डॉक्टरों ने पांच अलग-अलग मौकों पर बताया था कि उनका बच्चा जीवित नहीं बचेगा। उसका जन्म गर्भपात की तय समय सीमा से ठीक एक सप्ताह पहले हुआ था।

नॉटिंघमशायर में इस नवजात का जन्म जुलाई में हुआ था। उसके जन्म लेते ही मेनिन्जाइटिस के लक्षण दिखने लगे थे। डॉक्टरों ने हैना और डेनियल को बता दिया था उन्हें विश्वास है कि वह कभी भी इसे नहीं बचा सकेंगे। मगर, तमाम बाधाओं से लड़ते हुए बच्चे ने मौत को मात दे दी और अब वह घर लौट रहा है।

पहली बार मां बनी हन्ना ने कहा कि डॉक्टरों ने हमें बताया था कि जॉर्ज के जीवित रहने की संभावना एक लाख में से एक है। उसका इतने समय तक जीना लगभग असंभव लग रहा था। मुझे यकीन था कि वह मरने वाला था, इसलिए यह वास्तव में एक चमत्कार ही है कि जॉर्ज अब हमारे साथ यहां है। हन्ना ने बताया कि मेरी सामान्य गर्भावस्था थी और किसी भी जटिलता का अनुभव मैंने नहीं किया था।

मगर, 23 सप्ताह की गर्भावस्था होने पर हन्ना को पीठ दर्द महसूस होने लगा। उसने कहा कि मुझे वास्तव में लगा कि यह लेबर पेन हो सकता है क्योंकि यह काफी पहले होने लगा था। मैंने अस्पताल में जाकर डॉक्टर से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि यह लेबर पेन है। यह सुनकर मैं टूट गई थी। मुझे यकीन था कि जॉर्ज मृत पैदा होगा। मैं बहुत चिंतित था, मेरी दुनिया बिखर गई थी। हन्ना को 23 सप्ताह की गर्भावस्था के बाद चार दिनों तक अस्पताल में लेबर पेन सहना पड़ा और फिर जॉर्ज का जन्म हुआ।

उसे तुरंत ही प्लास्टिक के सैंडविच बैग में रखकर इन्क्यूबेटर में रख दिया गया था। मैं असहाय महसूस कर रही थी। उसकी तत्काल सर्जरी की गई थी। जॉर्ज का जन्म 31 अक्टूबर को होना था। उसके लीवर में सूजन थी और 40 फीसद खून बह गया था, लिहाजा उसकी सर्जरी करने का फैसला किया गया। हॉस्पिटल के चैपलेन ने उसे आशीर्वाद दिया। यह उसी का चमत्कार है कि अब वह हमारे साथ है।

आज तक कुल मिलाकर 20 से अधिक बार खून चढ़ाया जा चुका है और छह बार ऑपरेशन किया जा चुका है। अब उसके सातवें ऑपरेशन का इंतजार है, जो उनके दिल का होगा। हन्ना ने कहा कि जॉर्ज को फेफड़े की बीमारी है और वह लंबे समय तक बिना मदद के सांस लिए नहीं रह सकता। उसे रोजाना अस्पताल में लाना पड़ता है और उसका मूवमेंट भी बहुत सीमित है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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