लंदन, आइएएनएस। कोरोना वायरस (कोविड-19) का संक्रमण हमारे इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) को प्रभावित करता है। इसके पीछे के विज्ञान का विज्ञानियों ने पता लगा लिया है। एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि जो लोग गंभीर रूप से कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं, उनके शरीर में बनी एंटीबॉडी इंटरफेरॉन को रोक देती है। इंटरफेरॉन वायरस संक्रमित कोशिकाओं द्वारा उत्पादित वे प्रोटीन होते हैं, जो अन्य स्वस्थ कोशिकाओं को वायरस से सुरक्षा प्रदान करते हैं। यह प्रतिरक्षा तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

जर्नल साइंस में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-19 से मरने वाले ज्यादातर लोग बुजुर्ग होते हैं। लेकिन पांच से 10 फीसद युवा और बच्चे सार्स-सीओवी-2 वायरस से गंभीर रूप से संक्रमित हो सकते हैं। यह वायरस ही कोविड-19 का कारक है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि क्यों कुछ लोग संक्रमित होने पर बहुत बीमार हो जाते हैं और कुछ मामूली रूप से संक्रमित होते हैं।

नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन के शोधकर्ता और इस अध्ययन के मुख्य लेखक एस्टीन हुस्बे ने कहा, 'मौत और गंभीर संक्रमण से मामले महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक देखे गए हैं। हमारे अध्ययन से भी पता चला है कि पुरुषों में एंटीबॉडी भी अधिक होती है।

हुस्बे ने कहा कि वह इस अध्ययन से इसलिए जुड़े थे क्योंकि उन्होंने ऐसे रोगियों के साथ ज्यादा समय बिताया था जो एपीएस1 नामक इम्यून डिजीज से ग्रसित थे। एपीएस1 एक गंभीर लेकिन दुर्लभ इम्यून डिजीज है। एपीएस1 वाले मरीजों में इंटरफेरॉन के खिलाफ एंटीबॉडी काफी ज्यादा मात्रा में पाई जाती है। ऐसे मरीज यदि कोरोना वायरस से संक्रमित हो जाते हैं तो उनका शरीर इम्यून सिस्टम के खिलाफ काम करने लग जाता है और लोग ज्यादा परेशान होने लगते हैं। यही कारण है कि कई मरीजों में ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक इम्यून से जुड़ी समस्याएं देखी जाती हैं।

इंटरफेरॉन की सप्लाई हो सकती है मददगार:

हुस्बे ने कहा, ' यह देखना अपेक्षाकृत आसान है कि युवा कोरोना मरीजों के रक्त में एंटीबॉडीज हैं या नहीं। यदि जांच के परिणाम पॉजिटिव आते हैं तो उपचार के रूप में उन्हें अतिरिक्त इंटरफेरॉन की सप्लाई (आपूर्ति) सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे मरीजों को जल्द स्वस्थ होने में मदद मिल सकेगी। हालांकि उन्होंने ऐसी जांच के प्रति आगाह भी किया है। क्योंकि एपीएस1 वाले अधिकांश लोगों की समस्या का निदान बचपन में किया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले बहुत कम हैं जिसमें कोरोना मरीजों की इम्यून सिस्टम के खराब होने से मौत होती है। ज्यादातर लोग अन्य गंभीर समस्याओं के चलते अपनी जान गंवा देते हैं।

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