मक्का डील पाकिस्तान के लिए कैसे बनी गले की फांस, अब क्या करेंगे शहबाज?
सऊदी अरब और तुर्किये के साथ सैन्य समझौते में उलझा पाकिस्तान न तो अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट कर पा ...और पढ़ें

पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ।
HighLights
पाकिस्तान 'मक्का सैन्य समझौता' के कारण गंभीर कूटनीतिक स्थिति में फंसा।
समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा।
ईरान और चीन के बीच पाकिस्तान की दोहरी नीति उजागर हुई।
डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। ना घर का ना घाट का, दुश्मन अनाज का...आज के समय में पाकिस्तान पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। अब इसके कई उदाहरण है...चाहे पश्चिम एशिया के संघर्ष में खुद को सरपंच साबित करने की नाकाम कोशिश हो या फिर, सऊदी अरब और तुर्किए के साथ 'मक्का सैन्य समझौता' बनाकर खुद को मजबूत दिखाने की चाल।
अपनी इन्हीं हरकतों के चलते नापाक पड़ोसी पाकिस्तान को हमेशा से ही वैश्विक मंच पर भारी किरकिरी का सामना करना पड़ा है। हालांकि गौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान तो पाकिस्तान है, उसे कहां फर्क पड़ने वाला....
अब मक्का समझौता में कहां फंस गया नापाक पड़ोसी?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि एक तरफ वह सऊदी अरब के साथ सैन्य पैक्ट में उलझ चुका है, तो दूसरी तरफ ईरान और चीन के बीच उसकी दोहरी नीति उसकी कूटनीतिक लाचारी को उजागर करती है। ऐसे में हर मोर्चे पर विफल होती पाकिस्तान की यह चालें साफ दर्शाती हैं कि पाकिस्तान अपनी हरकतों के चलते दुनिया भर में खुद अपनी फजीहत कराने में माहिर हो चुका है।
अब समझौता को रक्षात्मक बताने में जुटा पाकिस्तान
बता दें कि पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच हुए नए सैन्य समझौते 'मक्का डिफेंस अलायंस' को लेकर भू-राजनीतिक हलकों में खलबली मची हुई है।
ऐसे में पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने अल अरबिया को दिए इंटरव्यू में इस समझौते को 'रक्षात्मक' बताने की कोशिश की, लेकिन इस पैक्ट की शर्तों और पाकिस्तान की कूटनीतिक उलझनों ने उसकी जमकर किरकिरी करा दी है।
समझिए पाकिस्तान की फजीहत क्यों?
बीते 7 अगस्त को साइन किए गए इस समझौते के तहत यह प्रावधान है कि इनमें से किसी भी देश पर हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस अलायंस का सचिवालय शुरुआती तीन साल के लिए पाकिस्तान के पास है।
लेकिन इसी शर्त ने पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस बात को ऐसे समझिए कि सऊदी अरब पर लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैन्य मदद मांगी है? यदि मांगता है, तो पाकिस्तान क्या करेगा?
पीठ दिखाने की पाकिस्तान की नीति पुरानी
हालांकि इतिहास के पन्नों से देखे तो समझौते में पीठ दिखाना पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है। इससे पहले साल 2015 में भी पाकिस्तान की संसद ने सऊदी नीती गठबंधन में सेना भेजने से साफ इनकार कर दिया था। ऐसे में अब इस नए समझौते के तहत सऊदी रक्षा में कूदना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं है।
पाकिस्तानी सेना के गोलमोल जवाब
दूसरी तरफ जब पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता से यह पूछा गया कि यदि गठबंधन के किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो पाकिस्तान जमीनी स्तर पर क्या कदम उठाएगा और उसकी रणनीति क्या होगी?
इस पर प्रवक्ता ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि समझौते का सिद्धांत स्पष्ट है, लेकिन ऑपरेशनल डिटेल्स क्लासिफाइड यानी गोपनीय हैं। जानकारों का मानना है कि तीखे सवालों पर इस तरह के अस्पष्ट जवाब देना और यह न बता पाना कि आपात स्थिति में सेना भेजी जाएगी या नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की नीति की पोल खोलता है और उसकी किरकिरी कराता है।
ईरान और चीन के बीच कूटनीतिक टाइटरोप
अब इतनी बातों के बाद इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पाकिस्तान इस समझौते को लेकर एक अजीब और तनावपूर्ण कूटनीतिक स्थिति में फंस गया है। पूरे मामले को ऐसे समझिए कि पाकिस्तान की सीमा सीधे ईरान से मिलती है, जिसके साथ उसके संवेदनशील संबंध हैं।
दूसरी तरफ सऊदी अरब और ईरान के पारंपरिक तनाव के बीच, रियाद के साथ इस तरह का मिलिट्री पैक्ट साइन करना और खुद को 'शांतिदूत' बताना पाकिस्तान के पाखंड को दर्शाता है।
