नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। ताज्जुब होता है कि जिस धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और लोकतांत्रिक मूल्यों को जीने वाले भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना, उसकी आज भारत से तस्वीर 360 डिग्री बदली हुई है। भारत आतंकवाद विरोधी वैश्विक मोर्चे की धुरी बनकर विकास का पैरोकार बना हुआ है तो गर्त में जा रही अर्थव्यवस्था के साथ पाकिस्तान आतंकी संगठनों को खाद-पानी और जमीन मुहैया करा रहा है।

लश्कर-ए-तैयबा का गठन

अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं के कूच के साथ ही 1990 में हाफिज सईद ने लश्कर-ए-तैयबा का गठन किया। कश्मीर में भारत के खिलाफ जंग छेड़ना इसका मकसद था। 1993 में कश्मीर में छिटपुट आतंकी हमले किए। तब से यह भारत के खिलाफ अपना एजेंडा चला रहा है। इसके पास प्रशिक्षित लड़ाकों की फौज के साथ विशाल प्रोपेगंडा नेटवर्क है। इसके प्रकाशनों का सर्कुलेशन हजारों में है।

शीर्षनेतृत्व के अलावा सदस्यों की पहचान उजागर नहीं की जाती है। इस्लामिक मदरसों से पाकिस्तान के आतंकी संगठनों में केवल 10 फीसद ही भर्तियां की जाती हैं। शेष विश्वविद्यालयों, कॉलेज के छात्रों के साथ गरीब बेरोजगार युवाओं को शामिल किया जाता है।

घोषित हुआ आतंकी

2012 में अमेरिका ने हाफिज सईद को आतंकी घोषित करते हुए उस पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा। यह कदम मुंबई आतंकी हमले में मारे गए छह अमेरिकी नागरिकों को लेकर था। दबाव के चलते पाकिस्तान ने उसे घर में नजरबंद करने की नौटंकी भी की।

चुनाव लड़ने की तैयारी

मिल्ली मुस्लिम लीग नामक राजनीतिक पार्टी बनाकर वह पिछले चुनावों में उतरा लेकिन घरेलू और बाहरी स्तर पर काफी विरोध हुआ।

आतंकी संगठनों का उद्भव

1980 में पाकिस्तान में पहले आतंकी संगठन का तब उद्भव हुआ जब हजारों स्वयंसेवी अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरोध में सामने आये। इनमें ज्यादातर धार्मिक संगठनों के छात्र थे। 2001 तक पाकिस्तान में ऐसे संगठन कुकुरमुत्ते की तरह फैल गए। हालांकि इनमें प्रमुख 24 शामिल थे। अनुशासित आतंकी संगठनों का घरेलू और बाहरी मोर्चे पर अपना एक एजेंडा था। सभी समूहों के स्नोत एक थे, सबका एक ही लक्ष्य था और लड़ाकों को कमोबेश एक ही जगह से शामिल किया जाता था।

सत्ता का साथ

आतंकी संगठनों को पाकिस्तानी सरकार और सेना का वरदहस्त प्राप्त है। इनकी गतिविधियां जगजाहिर हैं। देश के हर कोने में ये पोस्टर, बैनर, रैली और आयोजन द्वारा अपने लक्ष्य और मकसद को ये बताते हैं। साथ ही वे सभी मुस्लिमों को साथ आकर इस लड़ाई में शामिल होने की अपील करते हैं।

सेना के साथ तालमेल

पिछली सदी के आखिरी दो दशक आते-आते इन आतंकी संगठनों का मकसद बहुत कुछ सेना के मकसद से जुड़ गया। पाकिस्तानी सेना की क्षेत्रीय रणनीति के तहत इनके लक्ष्य का जुड़ाव हुआ। इनके मकसद के दो अहम आयाम सामने आए। भारत से कश्मीर की आजादी और अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थिक ताकतों को स्थापित करना।

9/11 के बाद की तस्वीर

अमेरिका पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद आतंक के खिलाफ अमेरिकी युद्ध में पाकिस्तान को साथ आना पड़ा। सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने 12 जनवरी, 2002 को लश्करे तैयबा सहित पांच आतंकी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन दशकों से चली आ रही आतंकी संस्कृति से सत्ता पूरी तरह दूर नहीं रह सकी। इस प्रतिबंध से संगठनों की गतिविधियों पर बहुत असर नहीं पड़ा। पाकिस्तान में लश्करे तैयबा जमात उद दावा के बैनर तले काम करने लगा।

मुंबई हमला

2008 में मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद लश्करे तैयबा के ऊपर शिकंजा कसना शुरू हुआ। पाकिस्तान पर कार्रवाई का दबाव चरम पर पहुंच गया। पुख्ता सुबूत के बाद भी पाकिस्तानी अदालतों में चले मुकदमों में ये सब पाक- साफ निकले। हाफिज सईद के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया। पिछले कुछ सालों के दौरान लश्करे तैयबा प्रमुख हाफिज सईद ने ‘डिफेंस ऑफ पाकिस्तान’ बैनर के तहत रैलियां आयोजित करके अपनी सार्वजनिक प्रोफाइल को बढ़ा लिया है।

बढ़ा दबाव

बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच पाकिस्तानी सरकार ने 2003 में जमात उद दावा को आतंकी निगरानी सूची में डाल दिया। इस कदम से भी संगठन के क्रियाकलाप नहीं रुके। इसके कुछ कमांडरों ने जनजातीय इलाकों में जाकर अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो सेना के खिलाफ मोर्चा खोला। लश्कर-ए-तैयबा ने अलकायदा से मिलीभगत भी की।

Posted By: Sanjay Pokhriyal