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नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। अमेरिका ने अब तालिबान से किसी भी मुद्दे पर बातचीत करने के लिए साफतौर पर मना कर दिया है, इसके बाद अब ये सवाल उठने लगे हैं कि यदि भविष्य में अफगानिस्तान की सरकार में तालिबान का असर हो गया तो ये भारत के लिए अच्छा नहीं होगा। तालिबान पाकिस्तान के नजदीक है, पाकिस्तान के नजदीक होने की वजह से वो भी भारत के खिलाफ होने वाली गतिविधियों में किसी न किसी तरह से हिस्सा तो बनेगा ही। यदि भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कुछ किया तो तालिबान भी उसका दुश्मन हो जाएगा। दूसरी ओर ये भी कहा जा रहा है कि अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत में भारत भी कोई भूमिका निभा सकता है मगर अभी भारत भी इस मामले में पूरी तरह से शांत है, ऐसे समय का इंतजार किया जा रहा है। 


देशों की राजनीति समझने वालों का कहना है कि अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत में भारत ज्यादा सहयोग नहीं कर सकता। अगर अमरीका भारत के साथ ज्यादा दिखता तो इससे बिना बात के पाकिस्तान नाराज होगा, अमरीका ने भारत को इस बातचीत पर जरूरत के हिसाब से मामलों से अवगत कराया हुआ है, चाहे वो वॉशिंगटन या दिल्ली में राजनयिकों के माध्यम से हो या फिर अफगानिस्तान में अमरीका के विशेष को भारत भेजना हो।

अफगान सरकार में तालिबान का रहा असर तो भारत के लिए अच्छा नहीं 
दरअसल भारत ने बीते कई सालों से अफगानिस्तान में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं के सुधार में सहायता दी है लेकिन दोहा में पिछले एक साल से जारी बातचीत में न अफगानिस्तान सरकार शामिल थी और ना ही भारत सरकार। इस वजह से भारत चिंतित है कि अगर भविष्य की अफगानिस्तान की सरकार में तालिबान का असर रहा तो ये उसके लिए अच्छी खबर नहीं होगी। तालिबान पाकिस्तान के नजदीक है और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते पूरी दुनिया को पता है। पाकिस्तान एक आतंकी देश है और आतंकवाद को किस तरह से पनाह देता है ये किसी से छिपा नहीं है। सैकड़ों बार पाकिस्तान ने भारत की शांति व्यवस्था को खराब करने के लिए आतंकी भेजे हैं।

हमले में मारा गया अमरीकी सैनिक तो ट्रंप ने खत्म कर दी बातचीत 
इसी माह 5 सितंबर को काबुल के बेहद सुरक्षित जोन में तालिबान के एक कार बम हमले में 12 लोग मारे गए थे, इन मरने वालों में एक अमेरिकी सैनिक भी था, इसी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ बातचीत खत्म होने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद अफगानिस्तान में हिंसा में तेजी आई है। तालिबान में जिस जगह कार में विस्फोट हुआ वहां पर अफगानिस्तान सुरक्षा सर्विस नेशनल डायरेक्टोरेट ऑफ सिक्योरिटी का दफ्तर और अमरीकी दूतावास की इमारतें हैं।

पाकिस्तान बनेगा रोड़ा 
कुटनीति के जानकारों का कहना है कि तालिबान का भारत के साथ बेहतर संबंध हो, पाकिस्तान ऐसा नहीं होने देगा, खासकर जिस तरह से उनका तालिबान पर कंट्रोल है और ऐसे वक्त जब तालिबान के नेता, उनका परिवार पाकिस्तान के शहरों में रहता है, वो वहां की सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। 

अफगान सरकार में होगा तालिबान का रोल 
राजीनितज्ञों का कहना है कि आज नहीं तो कल, अफगानिस्तान में तालिबान का सत्ता में आना तय है और भारत भी ये समझता कि अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान में चिंता उचित है। अफगानिस्तान में कोई भी तालिबान का टेकओवर रोक नहीं सकता। भारतीय राजनयिक समझते हैं कि अमरीका की हवाई शक्ति के बिना अफगान सेना कुछ ही सप्ताह में बिखर जाएगी और कुछ ही वक्त में तालिबान सरकार को टेकओवर कर लेगी। अगर किसी भी देश का दूसरे देश के साथ दो या ढाई हजार किलोमीटर का खुला बॉर्डर होगा तो ये उसके लिए चिंता का विषय होगा। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में जो सरकार हो, उसके साथ उसके दोस्ताना संबंध हों। अगर पाकिस्तान ने अमरीका के साथ सहयोग शुरू कर दिया है तो इसका मतलब है कि अमरीका मानता है कि पाकिस्तान की चिंताएं उचित हैं। 

पाकिस्तान की जेब में है तालिबान  
तालिबान पाकिस्तान की जेब में हैं, पाकिस्तान की भी ज़रूरत है कि वो तालिबान के साथ चले, ये एक जटिल रिश्ता है जहां पाकिस्तान का प्रभाव अच्छा खासा है लेकिन ये प्रभाव सब कुछ नहीं है। ऐसा नहीं होगा कि तालिबान पाकिस्तान के फायदे के लिए काम करेंगे, वो अपने फायदे के लिए काम करेंगे। वो अफगान हैं, अफगानिस्तान की बात करेंगे, पाकिस्तान की नहीं लेकिन ये भी सही है कि तालिबान पाकिस्तान के ज्यादा नजदीक रहे हैं और रहेंगे। 

अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कोई दूसरा देश नहीं कर सकता 
अमरीकी सेना के वापस जाने के एवज में तालिबान इस बात पर राजी हुआ कि वो ये सुनिश्चित करेंगे कि कोई चरमपंथी संगठन अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के खिलाफ न करे। अफगानिस्तान में अभी भी करीब 14,000 अमरीकी सैनिक मौजूद हैं।

भारत की चिंता 
9-11 के हमलों में अमरीका में करीब 3,000 लोग मारे गए थे, जिसके लिए अमरीका ने इस्लामी चरमपंथी गुट ओसामा बिन लादेन को जिम्मेदार माना। ओसामा बिन लादेन उन दिनों अफगानिस्तान में तालिबान की शरण में था। अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और तालिबान को सत्ता से हटा दिया लेकिन तालिबान पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, अब उन्होंने धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं। तभी से अमरीका और उसके सहयोगी देशों की कोशिश रही हैं कि वो तालिबान के हमलों को बंद कर पाएं लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। 

अफगान का दोस्त भारत, आंतरिक मामलों में नहीं करता हस्तक्षेप 
अफगानिस्तान में भारत एक दोस्त की तरह देखा जाता है जिसने अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया है। अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत के दौरान भारत के कुछ महकमों में चिंता थी कि अगर भविष्य की अफगानिस्तान सरकार में तालिबान की महत्वपूर्ण भूमिका रही तो अफगानिस्तान की जमीन को भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है, खासकर तब जब तालिबान को पाकिस्तान के नजदीक देखा जाता है और पूर्व में भारत विरोधी चरमपंथी गुट अफगानिस्तान में अपने ट्रेनिंग कैंप लगाते रहे हैं। तालिबान का कहना है कि वो पहले अफगानिस्तान से अमरीकी सेना को हटाने पर बात करेंगे, उस पर सिर्फ अमरीका ही बात कर सकता है, तालिबान अफगानिस्तान सरकार को अमरीका की "कठपुतली" मानते हैं।

बातचीत खत्म होने पर अफगान सरकार 
अमरीका और तालिबान के बीच बातचीत खत्म होने की घोषणा पर अफगानिस्तान सरकार खुश है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि एक अमरीकी सैनिक की मौत पर अमरीका ने इतना बड़ा फैसला ले लिया और अमरीका-तालिबान की बातचीत के दौरान तालिबान हमलों में जो अफगान मारे गए, उनकी जिंदगी का क्या। 

भारत तालिबान से नहीं करेगा सीधा संपर्क 
भारत ने अभी तालिबान से सीधा राजनयिक संपर्क स्थापित करने के लिए कोई पहल नहीं की है, पाकिस्तान हो, ईरान हो, चीन हो या रूस या उज्बेकिस्तान, ये सारे लोग तालिबान से मिलते हैं, उन्हें बुलाते है, बातचीत करते हैं। उन्होंने ये ऑफर भी किया है कि हम अफगान शांति वार्ता में शामिल होने के लिए तैयार हैं अगर हिंदुस्तान सरकार ये फैसला कर ले कि हमें तालिबान के साथ मिलना है और बातचीत करनी है, तो तालिबान इसका पॉज़िटिव रिस्पांस देंगे।

तालिबान दूसरे देशों से बनाना चाहता है अच्छे रिश्ते 
तालिबान के राजनेता चाहते हैं कि उनके भी दूसरे देशों के साथ अच्छे रिश्ते बने रहे। इसी सिलसिले में वो मॉस्को, ईरान, चीन और पाकिस्तान भी गए हैं। भारत के जम्मू-कश्मीर पर तालिबान के वक्तव्य को इसी सोच से देखा जा रहा है। भारत ने जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया तब तालिबान ने भारत और पाकिस्तान से शांति और सोच-समझ रास्ते के इस्तेमाल को चुनने को कहा था।

भारत-पाक रिश्तों का अफगानिस्तान के साथ रिश्तों पर असर 
पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत का असर कम हो और पाकिस्तान के खिलाफ अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल न हो। भारत की कोशिश है कि उसके अफगान सरकार के साथ अच्छे ताल्लुक़ बरकरार रहें और अफगानिस्तान या फिर भविष्य की अफगान सरकार में तालिबान का असर इतना न बढ़े कि वो भारत के लिए मुसीबत पैदा करे यानि भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों का असर दोनो देशों के अफगानिस्तान के साथ रिश्तों पर पड़ता है। 

भारत और पाकिस्तान को अपनी आंतरिक मामलों को अफगानिस्तान से अलग रखना चाहिए। आज जब तालिबान और अमरीका के बीच बातचीत अंत तक पहुंचने से ठीक पहले रद्द कर दी गई है। अफगानिस्तान में ये बदलाव का दौर है और इस दौर में बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं, इस बदलाव के बाद नई सरकार सत्ता में आएगी और उस वक्त भारत को दोबारा शुरुआत करनी होगी। 

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Posted By: Vinay Tiwari

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