पाकिस्तान बनना चाहता है इस्लामिक देशों का सुरक्षा गार्ड, क्या अर्थव्यवस्था उठा पाएगी बोझ?
अगस्त में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्कीये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया कि किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।

पाकिस्तान बनना चाहता है मुस्लिम दुनिया का सुरक्षा गार्ड
HighLights
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्कीये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए
पाकिस्तान के पास बड़ी और अनुभवी सेना और परमाणु हथियार हैं
डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। पाकिस्तान खुद को मुस्लिम देशों के बीच एक सुरक्षा प्रदाता बनाने की कोशिश में जुटा है। सऊदी अरब और तुर्कीये के साथ मक्का रक्षा समझौते से लेकर हथियार निर्यात तक, इस्लामाबाद अपनी सैन्य ताकत को वैश्विक मंच पर बड़ा रोल दिलाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था इस महत्वाकांक्षा का खर्च उठा पाएगी?
रक्षा बजट बढ़ा, विकास घटा
जून में पेश किए गए 18.77 ट्रिलियन रुपये के बजट में रक्षा खर्च 18 प्रतिशत बढ़ाकर 3 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया। वहीं केंद्रीय विकास आवंटन घटाकर सिर्फ 1 ट्रिलियन रुपये कर दिया गया।
वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने कहा कि क्षेत्रीय अनिश्चितता को देखते हुए देश को अजेय बनाना जरूरी है। पाकिस्तान अभी 7 अरब डॉलर के आईएमएफ कार्यक्रम के तहत चल रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार को संभालने की जद्दोजहद में है।
मक्का पैक्ट: सामूहिक सुरक्षा समझौता
अगस्त में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्कीये ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया कि किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।
पाकिस्तान के पास बड़ी और अनुभवी सेना और परमाणु हथियार हैं। सऊदी अरब के पास पैसा और प्रभाव है, जबकि तुर्कीये के पास नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना और मजबूत रक्षा उद्योग है।
लेकिन हूती हमलों के बाद पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि अभी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई है। यह सावधानी उसकी सीमाओं को दर्शाती है।
हथियार निर्यातक बनने की कोशिश
2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष (ऑपरेशन सिंदूर) के बाद पाकिस्तान अपने हथियारों को ‘कॉम्बैट टेस्टेड’ बताकर बेचने की कोशिश कर रहा है। जेएफ-17 फाइटर जेट, ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और बख्तरबंद वाहनों की 13 देशों से बातचीत चल रही है।
संभावित खरीदारों में सऊदी अरब, इंडोनेशिया, सूडान, नाइजीरिया, मोरक्को और इथियोपिया शामिल हैं। जेएफ-17 को 30-40 मिलियन डॉलर में पेश किया जा रहा है, जो पश्चिमी विकल्पों से सस्ता है।
आर्थिक हकीकत
पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा और आर्थिक हकीकत में बड़ा अंतर है। एक तरफ वह सुरक्षा प्रदाता बनना चाहता है, दूसरी तरफ घरेलू स्थिरता के लिए संघर्ष कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती, तब तक ये महत्वाकांक्षाएं सिर्फ कागजी साबित हो सकती हैं।
