सऊदी में 8000 सैनिक तैनात, पर हूती विद्रोहियों पर सीधे हमले से इनकार... यमन संकट पर दोहरी नीति क्यों अपना रहा पाकिस्तान?
पाकिस्तान ने न्यूयॉर्क टाइम्स की उस रिपोर्ट को खारिज किया है, जिसमें यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई का दावा किया गया था।

यमन संघर्ष पर पाकिस्तान की दोहरी नीति (फोटो-रॉयटर्स)

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डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। पाकिस्तानी सरकार ने अमेरिकी अखबार की न्यूयॉर्क टाइम्स की उस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें दावा किया गया था पाकिस्तानी सेना ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की है।
यह बयाने ऐसे समय में आया है जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर और सऊदी अरब के ऊर्जा बिनियादी ढांचे पर लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले किए जा रहे हैं।
यमन संघर्ष का इतिहास
हूती-सऊदी संघर्ष की जड़े यमन में सत्ता के दीर्घकालिक विवाद और रियाद-तेहरान के बीच क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता में निहित हैं। 1990 के दशक में उभरे जैदी शिया हूती आंदोलन ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा जमा लिया था। इसके जवाब में मार्च 2025 में सऊदी अरब ने एक सैन्य गठबंधन का नेतृत्व करते हुए यमन के गृह युद्ध में हस्तक्षेप किया, जिसके चलते क्षेत्र में भयानक मानवीय संकट पैदा हुआ।
वर्ष 2026 में यह संघर्ष एक बार फिर भड़क उठा है। हूतियों ने बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट में समुद्री नाकेबंदी फिर से शुरू कर दी है और सऊदी तेल व यूटिलिटी सुविधाओं को निशाना बनाया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा परिवहन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
सऊदी अरब में पाकिस्तान का बड़ा सैन्य ढांचा
हालांकि पाकिस्तान प्रत्यक्ष हमले से इनकार कर रहा है, लेकिन सऊदी अरब में उसकी सैन्य मौजूदगी बेहद व्यापक है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्तमान में सऊदी अरब में लगभग 8 हजार पाकिस्तानी सैनिक तैनात है।
पाकिस्तानी वायु सेना का बड़ा सैन्य ढांचा सऊदी में तैनात है। चीन-पाकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित JF-17 थंडर फाइटर जेट्स का एक पूरा स्क्वाड्रन और मिलिट्री ड्रोन के दो स्क्वाड्रन सऊदी अरब में मौजूद हैं। वहीं चीन निर्मित HQ-9 लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम तैनात है।
इन सभी हथियारों को पाकिस्तानी सैनिक ही ऑपरेट करते हैं, जबकि इनके रखरखाव, तैनाती और लॉजिस्टिक्स का पूरा खर्च सऊदी अरब उठाता है। सऊदी सरकार इस्लामाबाद को प्रति सैनिक भुगतान भी करती है।
मक्का समझौता और अन्य रक्षा समझौते
हालिया हमलों के बाद पाकिस्तानी के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज आसिम मुनीर ने रियाद का दौरा कर सऊदी अरब और तुर्किए के सेना प्रमुखों के साथ उच्च स्तरीय वातचीत की। तीनों देशों ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा, पाकिस्तान और सऊदी अरब 2025 के रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते से भी जुड़े हुए हैं।
बैठक में तीनों देशों के सैन्य प्रमुकों ने सऊदी अरब की प्रादेशिक अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई। समझौते में शामिल तुर्किए फिलहाल एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और तकनीकी सहायता देने पर विचार कर रहा है, हालांकि तुर्किए संसद से मंजूरी न मिलने के कारण उसकी भूमिका फिलहाल सीमित है।
सऊदी के सुरक्षा ढांचों में पाकिस्तान की भूमिका
सऊदी अरब के नेतृत्व वाले दो मुख्य सुरक्षा ढांचों में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (IMCTC): 43 देशों के इस समूह की कमान 2017 से पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ संभाल रहे हैं।
मल्टीनेशनल मैरीटाइम डिफेंस कोएलिशन: लाल सागर में हूती खतरों से निपटने के लिए बने इस गठबंधन में पाकिस्तान के पास डिप्टी कमान है।
हूती विद्रोहियों को आतंकवादी घोषित किए जाने के बावजूद, इन दोनों बहुराष्ट्रीय गठबंधनों को वर्तमान संकट में सीधे तौर पर सक्रिय नहीं किया गया है।
क्षेत्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी सीमाओं पर जारी अशांति के बीच किसी नए युद्ध में सीधे कूदने से बच रहा है, जिससे उसके औपचारिक रक्षा समझौते फिलहाल केवल कागजी रक्षा तंत्र तक सीमित नजर आ रहे हैं।
