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बिखरने वाला है पाकिस्तान... बलूचिस्तान-खैबर पख्तूनख्वा में बगावत, कमजोर पड़ी शहबाज सरकार

Published: Fri, 07 Aug 2026 10:03 AM (IST)

पाकिस्तान गहरे सुरक्षा और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है, जहां बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और PoK में विद्रोह भड़क उठा ...और पढ़ें

बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और PoK में बगावत से हिली शहबाज सरकार

बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और PoK में बगावत से हिली शहबाज सरकार

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डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। पाकिस्तान इस समय गहरे सुरक्षा और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। पाकिस्तान के प्रमुख प्रांतों बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में बगावत की आग भड़क चुकी है।

पाकिस्तान में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि कई इलाकों में पाकिस्तानी सेना और सरकार का नियंत्रण पूरी तरह से खत्म हो गया है। इन इलाको में विद्रोही गुट अपनी समानांतर सत्ता चला रहे हैं।

बलूचिस्तान में BLA और विद्रोहियों ने जमाया कब्जा

बलूचिस्तान में अलगाववादी बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और पश्तून विद्रोहियों ने देश के लगभग 45 प्रतिशत क्षेत्रफल में फैले इस सूबे के करीब 70 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा जमा लिया है। क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे शहरों में हथियारबंद BLA लड़ाके बैखौफ और खुले आम घूमते हैं।

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यह लड़ाके पुलिस थानों पर हमले कर रहे हैं और सड़कों पर नाके लगाकर गाड़ियों से वसूली कर BLA के लिए फंड जुटा रहे हैं। स्थानीय लोगों में चीन और अमेरिका के हस्तक्षेप को लेकर भारी गुस्सा है।

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ग्वादर पोर्ट पर चीन के करीब 3 लाख करोड़ रुपए के निवेश और बड़ी चीनी बोट्स के कब्जे के कारण स्थानीय बलूच मछुआरे बेरोजगार हो रहे हैं। वहीं सोने, तांबे और गैस जैसे खनिज खजाने से समृद्ध होने के बावाजूद बलूच नागरिकों का आरोप है उन्हें अपने ही घर में द्वितीय दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया है।

BLA का गठन 1970 के दशक में हुआ था, जिसे पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमेरिका एक आतंकी संगठन मानते हैं। 1947-1948 से ही बलूचिस्तान के नागरिक पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे, क्योंकि उनका आरोप है कि पाकिस्तान उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक मानता है।

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इसी वजह से BLA एक अलग मुल्क की मांग को लेकर पाकिस्तान में लगातार आतंकी हमले करता आ रहा है, जबकि वर्ष 1973 में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत, इराक, अफगानिस्तान और सोवियत रूस पर BLA को समर्थन देने का आरोप भी लगाया था।

खैबर पख्तूनख्वा में TTP का दबदबा

दूसरी तरफ, अफगानिस्तान की सीमा से लगे खैबर पख्तूनख्वा में तालिबान और उससे जुड़े आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान (TTP) का खौफनाक दबदबा है। यहां पाकिस्तानी कानून नहीं, बल्कि तालिबान का शरिया और कबिलाई लोया जिरगा की हुकूमत चलती हैं।

TTP के लगातार बढ़ते हमलों से पस्त होकर पाकिस्तानी सेना को डूरंड लाइन पर अपनी 50 फौजी चौकियां खाली करनी पड़ी हैं। इस साल TTP द्वारा किए गए 145 से ज्यादा हमलों में दर्जनों सैनिक मारे जा चुके हैं, जिसके कारण पंजाब और सिंध के कर्मचारी इस इलाके में पोस्टिंग लेने से कतरा रहे हैं।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि TTP और आईएसकेपी जैसे संगठनों के आपसी तालमेल ने खैबर पख्तूनख्वा में सरकारी तंत्र की जड़ें हिला दी हैं।

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तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की शुरुआत दिसंबर 2007 में हुई थी। इसे बैतुल्लाह महसूद ने लगभग 13 से 40 चरमपंथी कबीलाई गुटों को मिलाकर बनाया था।

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इसका मुख्य मकसद पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार और सेना को हटाकर वहां अपनी कट्टर शरिया (इस्लामी कानून) व्यवस्था लागू करना है। TTP के लड़ाके पाकिस्तानी सेना और पुलिस को अपना दुश्मन मानकर उन पर लगातार खूनी आतंकवादी हमले है।

PoK में सरकार के दमन के खिलाफ आक्रोश

वहीं, PoK में भी लोगों के अंदर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ जनता का आक्रोश चरम पर है। इस्लामाबाद ने 45 लाख की आबादी को दबाने के लिए करीब 1 लाख फौजी तैनात कर दिए हैं। पूरे इलाको को फौजी पिंजरे में तब्दील कर दिया है।

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यहां हर जगह सख्त चेकिंग और पाबंदियों के बावजूद, पाकिस्तानी सेना की भारी गोलीबारी और दमनकारी नीतियों के सामने स्थानीय जनता अब पीछे हटने को तैयार नहीं है। अपने हक के लिए सड़कों पर उग्र प्रदर्शन कर रही है।

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PoK में हिंसक प्रदर्शनों का मुख्य कारण बढ़ती महंगाई, बिजली और आटे की भारी किल्लत, तथा शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों से जुड़ा विवादास्पद चुनावी और राजनीतिक ढांचा है।

तीनों सीमाओं पर एक साथ भड़की इस बगावत ने पाकिस्तान की सेना और हुकूमत के पसीने छुड़ा दिए हैं। पाकिस्तान सरकार तीन तरफ से उठ रहीं विद्रोह की आवाजों को संभालने में नाकाम साबित हो रही है।