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पाकिस्तान में 128 साल से गिरफ्तार है बरगद का पेड़, आज भी जंजीरों में जकड़ा; क्या है वजह?

By Shubham KumarEdited By: Shubham Kumar
Published: Sun, 04 Oct 2026 03:44 PM (IST)Updated: Sun, 04 Oct 2026 03:47 PM (IST)

साल 1898 के ब्रिटिश राज में एक शराबी अंग्रेजी अफसर की सनक ने हद पार कर दी, जब उसने एक बरगद के पेड़ को गिरफ्तार करने का फरमान सुनाया।

पाकिस्तान के इतिहास का वो काला सच (एआई से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

पाकिस्तान के इतिहास का वो काला सच (एआई से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)

HighLights

  1. पाकिस्तान के खैबर दर्रे में 128 साल से 'गिरफ्तार' बरगद।

  2. 1898 में नशे में धुत ब्रिटिश अधिकारी ने जंजीरों में जकड़वाया।

  3. औपनिवेशिक क्रूरता और मनमानी व्यवस्था का मूक प्रतीक आज भी।

डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। क्या आप सोच सकते हैं कि कभी कोई पेड़ भी गिरफ्तार हो सकता है? अगर हां, तो आखिर पेड़ का अपराध क्या होगा? सुनने में यह बात किसी फिल्मी ड्रामे जैसा लग सकता है, लेकिन विश्वास कीजिए....ये कहानी कोई फिल्मी ड्रामा की नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के खैबर दर्रे की है। जहां 128 साल से ऐसा ही एक बरगद का पेड़ 'गिरफ्तार' है।

वास्तव में यह बात साल 1898 की है, जब यह पूरा इलाका ब्रिटिश राज के अधीन था। इसी समय की बात है, जब एक नशे में धुत अंग्रेजी अफसर ने अपनी सनक में इस मूक पेड़ को अपनी तरफ बढ़ते देख ऐसा आदेश दिया कि वह कहीं भाग न जाए।

खैर, एक वो दिन था और एक आज का दिन... वह अधिकारी और वह हुकूमत इतिहास बन चुकी है, लेकिन यह बेजुबान पेड़ आज भी जंजीरों में कैद होकर औपनिवेशिक ताकतों की तानाशाही और उस दौर की बेतुकी व्यवस्था की मूक दास्तान बयां कर रहा है। आइए इस पेड़ के पूरे इतिहास के बारे में जानते हैं।

नशे में अंग्रेजी अफसर ने दिया था वो फरमान...

जंजीरों में अकड़े पेड़ का इतिहास बताता है कि ब्रिटिश अफसर ने नशे की हालत में देखा कि यह बरगद का पेड़ उसकी तरफ बढ़ रहा है। उसे ऐसा लगा कि यह पेड़ कहीं भागकर पेशावर न पहुंच जाए।

बस फिर क्या था, अपनी सनक में उसने गुस्से में आकर एक सार्जेंट को आदेश दिया कि इस पेड़ को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और जंजीरों से बांध दिया जाए, ताकि यह भाग न सके। सार्जेंट ने भी आदेश का पालन करते हुए पेड़ को भारी जंजीरों में जकड़ दिया। तब से लेकर आज तक यह पेड़ वैसे ही जंजीरों में बंधा हुआ है।

मजाक या औपनिवेशिक क्रूरता का प्रतीक?

शुरुआत में यह घटना एक अजीब मजाक या शराबी अधिकारी की बेवकूफी लग सकती है। लेकिन जब इसे उस दौर के इतिहास के नजरिए से देखा जाता है, तो इसके मायने बिल्कुल बदल जाते हैं।

A banyan tree shackled in chains in Pakistan

कुल मिलाकर, यह घटना उस समय के क्रूर और दमनकारी ब्रिटिश शासन की मानसिकता को दर्शाती है। उस दौर में अंग्रेजों के लिए किसी भी इंसान या चीज को दबा देना, सजा देना या कानून के दायरे से परे मनमाने फैसले लेना आम बात थी।

1897 जब अफ्रीदी आदिवासियों ने किया था हमला

सोचने वाली बात यह भी है कि, जिस समय यह घटना घटी, उससे ठीक पहले यानी 1897 में स्थानीय अफ्रीदी आदिवासियों ने ब्रिटिश चौकियों पर जोरदार हमले किए थे। इलाके में तनाव का माहौल था और अंग्रेज अपनी ताकत दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। ऐसे में एक बेजुबान पेड़ को सजा देना उनकी तानाशाही का ही एक रूप था।

आज भी पेड़ क्यों है जंजीरों में?

अब वो समय तो चलिए मान लिया जाए कि ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता का था, लेकिन अब सवाल यह है कि आज जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज डूब चुका है, नक्शे बदल चुके हैं और पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश बन चुका है। वह अधिकारी और हुकूमत भी इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन वह पेड़ आज भी जंजीरों में कैद क्यों है?

आलम यह है कि 128 साल बाद स्थानीय लोग और पर्यटक आज इस अजीबोगरीब नजारे को देखने दूर-दूर से आते हैं। यह जकड़ा हुआ पेड़ आज उस दौर की याद दिलाता है जब पूरी दुनिया और खुद यह इलाका औपनिवेशिक ताकतों की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। पेड़ बोल नहीं सकता था, विरोध नहीं कर सकता था, लेकिन आज यह मूक पेड़ उस दौर की दास्तां बयां कर रहा है और चीख-चीख कर यह कहता है कि 'हां मैं गिरफ्तार हूं।'