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बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 'ऑपरेशन सिंदूर' पर विवादित पोस्ट री-पोस्ट करने वाली छात्रा पर दर्ज FIR खारिज

Published: Tue, 27 Oct 2026 11:12 PM (IST)

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पुणे की इंजीनियरिंग छात्रा के खिलाफ आपराधिक मामला खारिज कर दिया है, जिसे भारत-पाक तनाव पर ...और पढ़ें

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने छात्रा का आपराधिक मामला खारिज किया

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने छात्रा का आपराधिक मामला खारिज किया

HighLights

  1. मुंबई उच्च न्यायालय ने छात्रा का आपराधिक मामला खारिज किया

  2. विवादित इंस्टाग्राम पोस्ट री-पोस्ट करने पर हुई थी गिरफ्तारी

  3. अदालत ने इसे अनजाने में हुई गलती, सुधार का मौका बताया

राज्य ब्यूरो, मुंबई। मुंबई उच्चन्यायालय ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पुणे की 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्रा के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

अदालत ने टिप्पणी की कि छात्रा का यह कदम अनजाने में की गई ‘एकल घटना’ थी, जिसके बाद उसने खुद ही उस पोस्ट को डिलीट कर दिया था और अपनी गलती पर गहरा पछतावा भी जताया था।

मुंबई उच्च न्यायालय ने छात्रा का आपराधिक मामला खारिज किया

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस मिलिंद जाधव की एकल पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में युवाओं को सुधरने का एक मौका दिया जाना बेहद आवश्यक है।

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि छात्रा को पहले ही पुलिस कस्टडी का सामना करना पड़ा है, जो कि किसी भी युवा छात्र के जीवन पर एक ऐसा गहरा दाग है जिसे आसानी से मिटाया नहीं जा सकता।

यह मामला पिछले साल (9 मई 2025) का है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच 'ऑपरेशन सिंदूर' को लेकर तनाव चरम पर था। इसी दौरान पुणे के एक निजी कॉलेज की इस छात्रा को भारत-पाक तनाव से जुड़े एक विवादित इंस्टाग्राम री-पोस्ट के कारण गिरफ्तार किया गया था।

अदालत ने इसे अनजाने में हुई गलती, सुधार का मौका बताया

ऑपरेशन सिंदूर के तनाव के बीच, 7 मई 2025 को छात्रा ने 'रिफॉर्मिस्तान' नामक एक अकाउंट से मूल रूप से पोस्ट की गई सामग्री को अपने इंस्टाग्राम पर री-पोस्ट कर दिया था, जिसमें भारत सरकार की आलोचना की गई थी।

उच्चन्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा है विवादित पोस्ट की लेखक वह छात्रा खुद नहीं थी। उसने केवल इंटरनेट मीडिया पर पहले से मौजूद सामग्री को री-पोस्ट किया था।

न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि यह पोस्ट निश्चित रूप से विवादित और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली थी, लेकिन केवल किसी प्रकाशन से किसी की भावनाएं आहत होने या नाराजगी बढ़ने मात्र से आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। जब तक कि यह कानून द्वारा स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित न हो, तब तक आपराधिक कानून को लागू नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि इंटरनेट मीडिया पर धमकियां मिलने के बाद छात्रा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने किसी जांच एजेंसी के कहने से पहले ही, महज दो घंटे के भीतर उस पोस्ट को डिलीट कर दिया। साथ ही सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी।

इससे साबित होता है कि उसका इरादा धार्मिक शत्रुता बढ़ाने का नहीं था। बता दें कि छात्रा ने न केवल अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी, बल्कि संस्थान द्वारा उसे कॉलेज से निकाले जाने के फैसले को भी मनमाना बताते हुए उसे उच्चन्यायालय में चुनौती दी थी।

उच्चन्यायालय ने पिछले साल मई में ही उसकी गिरफ्तारी की तीखी आलोचना करते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था और अब उसे पूरी तरह कानूनी राहत दे दी है।