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खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू: कैसे पाकिस्तान के ही पाले आतंकियों ने उसे डसा?

Published: Sun, 18 Oct 2026 10:09 PM (IST)

खैबर पख्तूनख्वा में 11 अक्टूबर को आपातकाल लागू होने से प्रांत संघीय नियंत्रण में आ गया है, जिससे इमरान खान की पार्टी PTI का क्षेत्रीय प्रशासन निलंबित हो गया।

कैसे पाकिस्तान के ही पाले आतंकियों ने उसे डसा। (रॉयटर्स)

कैसे पाकिस्तान के ही पाले आतंकियों ने उसे डसा। (रॉयटर्स)

HighLights

  1. खैबर पख्तूनख्वा में 11 अक्टूबर को आपातकाल लागू।

  2. पाकिस्तान की आतंकी नीति अब देश के लिए खतरा।

  3. PTI प्रशासन निलंबित, प्रांत संघीय नियंत्रण में आया।

डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक बार कहा था कि आप अपने घर के पीछे सांप नहीं पाल सकते और यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे सिर्फ पड़ोसियों को ही काटेंगे, क्योंकि आखिरकार वे अपने पालने वालों पर ही हमला कर देंगे। यह बात आज पाकिस्तान के हालात पर सटीक बैठती है।

11 अक्टूबर को खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू होने से यह प्रांत सीधे संघीय नियंत्रण में आ गया है। इसके चलते, जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ' (PTI) के नेतृत्व वाला क्षेत्रीय प्रशासन प्रभावी रूप से निलंबित हो गया है।

संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत उठाया गया यह कदम ऐसे समय में आया है जब सुरक्षा हालात बिगड़ रहे हैं और विपक्षी नेताओं तथा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान की उस दशकों पुरानी नीति पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके तहत वह रणनीतिक फायदे के लिए आंतकी समूहों का इस्तेमाल करता रहा है।

आलोचकों का कहना है कि इस नीति ने उस हिंसा को बढ़ावा दिया है, जो अब खुद पाकिस्तान के अपने क्षेत्र के लिए खतरा बन गई है।

खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू

इस आपातकाल के जरिए खैबर पख्तूनख्वा के 12 जिलों पर संघीय नियंत्रण हो गया है। इससे उस प्रांत में चुनी हुई सत्ता और कमजोर हो गई है, जो लंबे समय से पाकिस्तान की सुरक्षा नीतियों के बुरे परिणाम भुगत रहा है। यह कदम सालों की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद उठाया गया है, जिसमें इमरान खान की गिरफ्तारी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले संवैधानिक संशोधन और PTI के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार को हटाना शामिल है।

समाचार एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, सत्ता का गैर-चुने हुए लोगों के हाथों में केंद्रित होना और नागरिक मामलों में सेना की बढ़ती भूमिका ने पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

दशकों की आतंकी नीति और उसके दुष्परिणाम

पाकिस्तान के सुरक्षा संकट की जड़ें बहुत गहरी हैं, जो राज्य की नीति के एक हथियार के रूप में आतंकी समूहों के लंबे समय तक इस्तेमाल से जुड़ी हैं। पांच दशकों से भी अधिक समय से, पाकिस्तान ने सशस्त्र समूहों के साथ संबंध बनाकर रणनीतिक गहराई हासिल करने की कोशिश की है। इस दौरान उसने कुछ समूहों को उपयोगी माना, जबकि अन्य को खतरा समझा।

इस दृष्टिकोण ने हिंसा के एक ऐसे चक्र को जन्म दिया है, जो अब देश के भीतर ही पलट गया है। पाकिस्तान ने बार-बार आतंकी संगठनों के प्रति अपना रुख बदला है, जिसमें वे समूह भी शामिल हैं जो खुद उसके सुरक्षा बलों के दुश्मन हैं।

इस नीति के व्यापक परिणामों का सामना करने के बजाय, पाकिस्तान लगातार उग्रवादी गुटों के बीच फर्क करता रहा है, कुछ को वह 'स्वीकार्य' मानता है, जबकि कुछ को खत्म करना चाहता है। इसके चलते सुरक्षा व्यवस्था बार-बार विफल रही है, जिससे आम नागरिक, खासकर आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोग एक लंबे संघर्ष के केंद्र में आ गए हैं।

आपातकाल और चुनी हुई सत्ता का कमजोर होना

आपातकाल लागू करना पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र में सत्ता के केंद्रीकरण का एक और चरण है। संघीय हस्तक्षेप ने पीटीआई के नेतृत्व वाले प्रांतीय प्रशासन को हटा दिया है, जिससे विपक्ष के पास बची-खुची प्रांतीय सरकार भी नहीं रही।

यह कदम इमरान खान की गिरफ्तारी और उन संवैधानिक बदलावों के बाद उठाया गया है, जिन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया है और सैन्य नेतृत्व को जवाबदेही से बचा लिया है। आलोचकों का तर्क है कि इन घटनाओं ने उन संस्थानों को कमजोर कर दिया है, जिनका काम कार्यकारी और सैन्य शक्तियों पर अंकुश लगाना था।

विपक्ष पर कार्रवाई से अधिकारों को लेकर चिंताएं बढ़ीं

इस हस्तक्षेप के साथ-साथ विपक्ष पर व्यापक कार्रवाई भी की गई है। नेताओं और विधायकों को हिरासत में लिया गया है, उनके घरों पर छापे मारे गए हैं और राजनीतिक प्रदर्शनों को दबाया गया है। प्रदर्शनकारियों को पुलिस की गोलीबारी, आंसू गैस और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा है।

राजनीतिक विरोधियों के साथ किए गए इस बर्ताव ने ऐसी चिंताओं को जन्म दिया है कि असहमति को अब सुरक्षा के लिए खतरा माना जाने लगा है। प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग ने सरकार के उस दावे पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें कहा गया था कि कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए विशेष कदम उठाने की जरूरत है।

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