नई दिल्ली, जेएनएन। वैसे तो एफएटीएफ का फैसला शुक्रवार को आएगा, लेकिन मलेशिया और चीन जैसे भरोसेमंद सहयोगियों के पाला बदलने के बाद पाकिस्तान का निगरानी सूची (ग्रे लिस्ट) में बने रहना तय माना जा रहा है। वहीं आतंकी फंडिंग को लेकर पाकिस्तान को काली सूची (ब्लैक लिस्ट) में शामिल किये जाने की मांग करने वाला भारत उसके निगरानी सूची में बने रहने से भी संतुष्ट नजर आ रहा है। भारत का मानना है कि निगरानी सूची में बने रहने पर भी पाकिस्तान पर आतंकी फंडिंग रोकने और अपनी धरती पर सक्रिय आतंकी संगठनों पर कार्रवाई के लिए दबाव बना रहेगा।

दरअसल 2018 से ही आतंकी फंडिंग को लेकर एफएटीएफ की निगरानी सूची में शामिल पाकिस्तान इससे निकलने का भरसक कोशिश करता रहा। पाकिस्तानी अदालत ने आतंकी फंडिंग को लेकर आतंकी संगठन लश्करे तैयबा के प्रमुख और मुंबई हमले के मास्टरमाइंड को 11 साल की सजा भी सुना दी। इसके माध्यम से पाकिस्तान दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि आतंकी फंडिंग के खिलाफ कार्रवाई को लेकर वह गंभीर है।

लेकिन एफएटीएफ की बैठक में पाकिस्तान की सभी पैंतरेबाजी धरी रह गई। यहां तक कि तुर्की को छोड़कर मलेशिया और चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया। मलेशिया और चीन दोनों का कहना था कि पाकिस्तान ने आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए भरसक कदम उठाए हैं, लेकिन अभी उसे बहुत कुछ करना बाकी है। वहीं अन्य देश आतंकी फंडिंग रोकने को लेकर एफएटीएफ के दिशानिर्देशों के पूरी तरह पालन पर अड़े हुए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि शुक्रवार को बैठक में पाकिस्तान में काली सूची में डाले जाने का फैसला भले ना हो पाए, लेकिन उसे निगरानी सूची से बाहर निकलने का रास्ता नहीं दिया जाएगा।

पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को कई दशकों से झेल रहा भारत उसके निगरानी सूची बने रहने को संतोषजनक मान रहा है। निगरानी सूची में बने रहने पर पाकिस्तान में आतंकी फंडिंग और आतंकी संगठनों पर हरकतों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी और उन पर लगाम लगाने के लिए दबाव बना रहेगा। इससे पाकिस्तान पहले की तरह खुलकर आतंकियों को अपने कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। इसके साथ ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा पाकिस्तान निगरानी सूची से बाहर निकलने के लिए मजबूरी में आतंकियों पर कार्रवाई के लिए मजबूर भी होगा।  

Posted By: Krishna Bihari Singh

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