नई दिल्‍ली [स्पेशल डेस्‍क]। चाहबार प्रोजेक्‍ट को बार-बार पाकिस्‍तान-चीन के बीच बन रहे आर्थिक गलियारे के प्रतिद्वंदी परियोजना के रूप में पेश किए जाने पर ईरान के पूर्व विदेश मंत्री कमाल खराजी ने ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि यह सीपैक की प्रतिद्वंदी योजना नहीं है बल्कि ईरान को आर्थिक तौर पर मजबूत करने वाला और उसकी अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती देने वाला प्रोजेक्‍ट है। उनके मुताबिक इससे ईरान के व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। उन्‍होंने पाकिस्‍तान इंस्टिट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स द्वारा आयोजित राउंड टेबल कांफ्रेंस के दौरान यह बात कही। इस मौके पर पूर्व राजनयिक समेत वरिष्‍ठ पत्रकार भी मौजूद थे। आपको बता दें कि यह इंस्टिट्यूट पाकिस्‍तान की विदेश नीति के लिए बतौर थिंक टैंक माना जाता है।

भारत को नहीं दिए गए चाहबार के एक्‍सक्‍लूसिव राइट्स 

कमाल ने इस दौरान यह भी कहा कि भारत ने चाहबार प्रोजेक्‍ट में काफी निवेश किया है। इसके बाद भी इस प्रोजेक्‍ट के एक्‍सक्‍लूसिव राइट्स भारत को नहीं दिए गए हैं। यह इस क्षेत्र के सभी देशों के लिए है और सभी देश इसमें भागीदार बन सकते हैं। इस प्रोजेक्‍ट का मकसद ईरान को मध्‍य एशिया से जोड़ना और अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती प्रदान करना है। उन्‍होंने सीधेतौर पर इस बात का खंडन किया कि यह प्रोजेक्‍ट चीन पाक के बीच बनने वाले सीपैक को चुनौती देने के लिए बनाया गया है।

कश्मीर पर बन सकता है मध्यस्थ 

भारत और पाकिस्‍तान के बीच वर्षों से कश्‍मीर मुद्दे पर भी उन्‍होंने अपनी राय रखी और इसको शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की बात कही। उन्‍होंने इस बात का भी जिक्र किया कि ईरान इस मुद्दे को सुलझाने में मध्‍यस्‍थता की भूमिका अदा कर सकता है। हालांकि यहां पर ये बताना जरूरी होगा कि भारत इस मुद्दे को सुलझाने में किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज करता रहा है। भारत का साफतौर पर कहना है कि यह दो देश के बीच का विवाद है और दोनों को ही इससे निपटना चाहिए।

अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान

विभिन्‍न देशों के बीच विवादों का जिक्र आने पर कमाल ने यह भी कहा कि पाकिस्‍तान हमेशा से ही अमेरिका का साथ देता आया है जबकि अमेरिका ने उन पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। लेकिन ईरान ने कभी भी इन बातों को मुद्दा नहीं बनाया है। इतना ही नहीं अमेरिका के दबाव में पाकिस्‍तान ने ईरानी कंपनियों को यहां पर कारोबार करने में भी कई अड़चनें डाली हैं। इससे दोनों देशों के बीच व्‍यापार प्रभावित हुआ है। अभी तक भी दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हकीकत नहीं बन पाया है। कमाल का कहना था कि इस एग्रीमेंट के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच व्‍यापार तेजी से बढ़ सकता है।

पाकिस्‍तान में राजनीतिक इच्‍छा शक्ति की कमी 

गौरतलब है कि कमाल खराजी 1997 से लेकर 2005 तक ईरान के विदेश मंत्री रहे थे। उन्‍होंने पाकिस्‍तान को आईना दिखाते हुए यहां तक कहा कि पाकिस्‍तान में राजनीतिक इच्‍छा शक्ति की कमी रही है और पाकिस्‍तान की सरकार हमेशा से ही अमेरिका के दबाव में फैसला लेती रही हैं। इनकी वजह हालात खराब हुए हैं। उनका कहना था कि गैस पाइपलाइन को लेकर भी यही चीज सामने आई है। ईरान ने इस दिशा में अपनी तरफ से सारा काम पूरा कर लिया लेकिन अमेरिकी दबाव के चलते पाकिस्‍तान ने इसका काम रोक दिया, जबकि इस प्रोजेक्‍ट में पाकिस्‍तान का ही फायदा था।

अफगानिस्तान को जल्द नहीं छोड़ेगा यूएस

अफगानिस्‍तान पर बात करते हुए पूर्व विदेश मंत्री कमाल खराजी का कहना था कि वह नहीं मानते हैं कि अमेरिका कभी भी अफगानिस्‍तान को खाली करेगा। इसकी वजह उन्‍होंने इसकी रणनीतिक स्थिति को बताया है। उनके मुताबिक यहां से वह अपने रणनीतिक हितों को साध रहा है। ऐसे में वह इसको जल्‍द छोड़ने वाला नहीं है। हालांकि उन्‍होंने यह भी कहा कि वह अफगानिस्‍तान की शांति के लिए सरकार और तालिबान के बीच मध्‍यस्‍थता की भूमिका निभाने को भी तैयार हैं, यदि यह किसी मुकाम तक पहुंचती हो। उनका कहना था कि अफगानिस्‍तान में अमेरिका की मौजूदगी के कोई मायने नहीं हैं। इस मसले को सुलझाने के लिए सभी पड़ोसी देशों को साथ आना चाहिए। यहां फैले तनाव का असर सभी पड़ोसी देशों पर दिखाई दे रहा है।

दूसरे देशों में दखल देने के सख्‍त खिलाफ

एक सवाल के जवाब में उन्‍होंने साफ कर दिया कि वह ताकतवर देशों द्वारा दूसरे देशों में दखल देने के सख्‍त खिलाफ हैं। उन्‍होने साफ कर दिया कि वह सीरियाई सरकार का समर्थन करते हैं, लेकिन अपने यहां पर फैले आईएस के सफाये के लिए इन्‍हें दूसरे देशों की मदद लेनी चाहिए। अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर उनका जवाब था कि इससे ईरान पर काफी गलत असर पड़ा है। लेकिन अब देश की अर्थव्‍यवस्‍था सुधर रही है। ईरान के लोग काफी समय से प्रतिबंधों को झेल रहे हैं।

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Posted By: Kamal Verma