विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

भावनाओं को समझने में महिलाएं आगे, पर यही खूबी बन जाती है उनके लिए बड़ा बोझ

Published: Sun, 11 Oct 2026 09:06 PM (IST)

एक शोध के अनुसार, महिलाएं पुरुषों की तुलना में भावनात्मक बुद्धिमत्ता में बेहतर प्रदर्शन करती हैं, खासकर दूसरों की भावनाओं को समझने में।

महिलाओं की भावनात्मक बुद्धिमत्ता (AI फोटो)

महिलाओं की भावनात्मक बुद्धिमत्ता (AI फोटो)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

डिजिटल डेस्क, ज्यूरिख। किसी बैठक में सहकर्मी का अचानक चुप हो जाना, किसी दोस्त के चेहरे से उसकी परेशानी भांप लेना या तनाव के बीच सही बात कहकर माहौल संभाल लेना। ये ऐसे कौशल हैं, जो रिश्तों को बेहतर बनाने के साथ कामकाज को भी आसान करते हैं।

लेकिन जब इन्हें किसी की स्वाभाविक खूबी मान लिया जाता है, तो यही क्षमता उसके लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी बन सकती है। महिलाओं के साथ अक्सर ऐसा ही होता है।

लिमरिक विश्वविद्यालय की मैरी एम हाउसफेल्ड और ज्यूरिख विश्वविद्यालय के योखेन मेंगेस ने 1995 से 2023 तक प्रकाशित शोधों की समीक्षा की। इसमें 76 देशों के छह लाख से अधिक लोग शामिल थे।

अध्ययन में औसतन महिलाओं का भावनात्मक बुद्धिमत्ता में प्रदर्शन पुरुषों से बेहतर पाया गया। यह बढ़त खास तौर पर दूसरों की भावनाओं को पहचानने, उनके कारण समझने और उनसे निपटने में मदद करने के मामले में दिखी। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि हर महिला इस मामले में हर पुरुष से बेहतर होती है।

बचपन से मिलता है ज्यादा अभ्यास

भावनात्मक बुद्धिमत्ता का मतलब अपनी और दूसरों की भावनाओं को पहचानने, समझने और संभालने की क्षमता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसकी एक वजह बचपन में लड़के-लड़कियों की परवरिश का अंतर हो सकता है। माता-पिता अक्सर बेटियों को भावनाओं पर बात करने और उन्हें शब्दों में व्यक्त करने के लिए ज्यादा प्रोत्साहित करते हैं, जबकि बेटों को कई बार भावनाएं दबाने की सीख मिलती है।

इस तरह लड़कियों को दूसरों की भावनाएं समझने और उनके अनुरूप प्रतिक्रिया देने का अधिक अभ्यास मिलता है। जैसे कोई भाषा या वाद्य यंत्र सीखने से उसमें दक्षता बढ़ती है, वैसे ही भावनात्मक कौशल भी अभ्यास से निखरते हैं। वर्ष 2019 में 58 अध्ययनों के मेटा-विश्लेषण में भी पाया गया कि प्रशिक्षण से भावनात्मक बुद्धिमत्ता विकसित की जा सकती है।

खूबी को जिम्मेदारी न बना दें

समस्या तब शुरू होती है, जब महिलाओं की इस क्षमता को कौशल मानने के बजाय उनकी स्वाभाविक जिम्मेदारी समझ लिया जाता है। दफ्तर में टीम का तनाव संभालना, परेशान सहकर्मी को सहारा देना और विवाद शांत करना अक्सर उन्हीं के हिस्से आता है। इससे कामकाज सुचारु रहता है, लेकिन प्रदर्शन के आकलन और पुरस्कारों में इस योगदान को जगह नहीं मिलती।

परिवार और दोस्तों के बीच भी किसी का हाल पूछना, उसकी परेशानी याद रखना और रिश्तों में बढ़ती दूरी को भांपना भावनात्मक श्रम है। यह काम अक्सर इसलिए नजरअंदाज हो जाता है, क्योंकि इसे सहज मान लिया जाता है।