बर्लिन, एपी। आर्कटिक रिसर्च मिशन के लिए वैज्ञानिकों के मेहनत पर महामारी कोविड-19 ने पानी फेर दिया। इस मिशन के लिए वैज्ञानिकों ने पूरा प्लान तैयार कर लिया था। इसके तहत बर्फ पर घूम रहे पोलर बियर को देखने की ट्रेनिंग भी ले चुके थे लेकिन चीन से निकला नॉवेल कोरोना वायरस वैज्ञानिकों के प्लान का हिस्सा ही नहीं था। अब क्वारंटाइन (quarantine) में दर्जनों वैज्ञानिक सब साफ होने का इंतजार कर रहे हैं ताकि एक साल लंबे आर्कटिक रिसर्च मिशन पर जा सकें। यह मिशन जलवायु परिवर्तन के लिए मॉडल में संशोधन करने के लिए है।

यह मिशन बस अब फाइनल फेज में ही पहुंचने वाला था इस बीच कोरोना वायरस का संकट बाधा बन गया अब ये वैज्ञानिक मिशन के लिए इंतजार को मजबूर हैं। यह मिशन जलवायु परिवर्तन के पूर्वानुमान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मॉडलों में सुधार करना है। 

महामारी की शुरुआत के बाद अंतरराष्ट्रीय मिशन को बंद करने की भी आशंका बलवती हो गई थी क्योंकि घातक वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए दुनिया के तमाम देशों में लॉकडाउन लागू हो गया। पिछले साल से ही आर्कटिक के ऊंचाई वाले इलाके में मौजूद जर्मन अनुसंधान पोत पोलरस्टर्न तक नयी आपूर्तियों एवं चालक दल भेजे जाने की योजना पर पानी फिर गया।  

कोलराडो यूनिवर्सिटी (Colarado University)  के वातावरणीय वैज्ञानिक और मोजेक खोज अभियान के सह-अगुवा मैथ्यू शूपे ने बताया कि वैश्विक महामारी के संकट ने पोत पर मौजूद वैज्ञानिकों के बीच भय और घबराहट का माहौल बना दिया। जर्मनी के ब्रेमरहेवन बंदरगाह से इंटरव्यू में उन्होंने बताया, 'कुछ लोग अपने परिवारों के साथ घरों के भीतर रहना चाहते थे।' उन्होंने आगे बताया कि यह अहम समय है जब समुद्री बर्फ के पिघलने का मौसम शुरू होने वाला है। वहीं कुछ अहम जानकारियों के लिए वैज्ञानिक महत्त्वपूर्ण उपकरणों को वहीं छोड़ने का विचार कर रहे हैं।

 

Posted By: Monika Minal

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस