एशिया पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए रखी गई थी डिएगो गार्सिया में सैन्य अड्डे की नींव, जानें पूरी इतिहास
डिएगो गार्सिया, लाल सागर के मुहाने पर स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर के पास मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग ...और पढ़ें

एशिया पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए रखी गई थी डिएगो गार्सिया में सैन्य अड्डे की नींव (AI Generated)
HighLights
ब्रिटेन ने 1966 में अमेरिका को एक प्रमुख सैन्य सुविधा के लिए 50 साल का पट्टा दिया था
अमेरिका ने 2003 में इराक युद्ध के दौरान डिएगो गार्सिया से कई हवाई अभियान चलाए गए थे
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ईरान ने हिंद महासागर के मध्य में स्थित अमेरिकी-ब्रिटेन के दो संयुक्त सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं हैं। आइए जानते हैं डिएगो गार्सिया के रणनीतिक महत्त्व और इसके इतिहास के बारे में।
कई हवाई अभियानों में हुआ इस्तेमाल
डिएगो गार्सिया, लाल सागर के मुहाने पर स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर के पास मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग 3,000 किमी की दूरी पर स्थित है। यह रणनीतिक स्थान लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों को इन दो महत्वपूर्ण समुद्री मागों तक पहुंचने में सक्षम बनाता है।
यह बेस अमेरिकी अंतरिक्ष बल के ट्रैकिंग बुनियादी ढांचे के लिए भी महत्वपूर्ण है। 1990-91 में फारस की खाड़ी युद्ध, 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी नेतृत्त्व वाले हमलों और 2003 में इराक युद्ध के दौरान डिएगो गार्सिया से कई हवाई अभियान चलाए गए थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पड़ी थी जरूरत
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब विश्व भर में उपनिवेशवाद का अंत हुआ और कई देशों को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, तो अमेरिकी नौसेना योजनाकारों को इस बात की चिंता सताने लगी कि शीत युद्ध के दौरान चीन और सोवियत संघ जैसे अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में विदेशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों तक पहुंच कम होती जा रही है।
उन्हें डर था कि हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी संघर्ष की स्थिति में, स्वेज नहर और सिंगापुर जलडमरूमध्य से होकर नौसेना का प्रवेश बाधित हो सकता है। इसका अर्थ यह था कि अमेरिकी नौसेना को हिंद महासागर में एक स्थायी ठिकाने की जरूरत है। डिएगो गार्सिया ही इसका समाधान था।
द्वीप का काला इतिहास
58 द्वीपों का चागोस द्वीप समूह 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक निर्जन था। इसके बाद फ्रांसीसियों ने अफ्रीका और भारत से दास श्रमिकों को लाकर नारियल के बागानों में काम करवाया।
1814 में फ्रांस ने इन द्वीपों को अंग्रेजों को सौंप दिया। 1968 से 1973 के बीच अमेरिकी-ब्रिटिश सैन्य अड्डे के लिए जगह बनाने के लिए लगभग 1,500 से 2,000 चागोसियन लोगों को उनके घरों से बेदखल कर मारीशस और सेशेल्स में स्थानांतरित कर दिया गया। सैकड़ों की संख्या में पालतू जानवरों और मवेशियों को मार डाला गया था।
अमेरिका का अहम सैन्य बेस है डिएगो गार्सिया
डिएगो गार्सिया ईरान से लगभग 4,000 किलोमीटर दूर मध्य हिंद महासागर में, भारत के दक्षिण और श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित दो महत्वपूर्ण अमेरिकी बमवर्षक लड़ाकू विमानों के बेस में से एक है। दूसरा अड्डा गुआम में स्थित एंडरसन वायु सेना अड्डा है। इस अड्डे पर बमवर्षक विमान, परमाणु पनडुब्बियां और मिसाइल विध्वंसक पोत तैनात हैं।
परमाणु हथियार होने की आशंका
1979 में ईरानी क्रांति के बाद खाडी क्षेत्र में फैली भारी अस्थिरता को देखते हुए डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य ठिकाने का सबसे बड़ा विस्तार हुआ। विमानवाहक पोतों के लिए बंदरगाह को गहरा किया गया। बी-1, बी-2 और बी-52 बमवर्षक विमानों के लिए 12,000 फुट लंबा रनवे बनाया गया और लगभग 1,000 मीटर लंबे विशाल जहाजों को पहले से ही तैनात कर दिया गया था। द्वीप पर अन्य उन्नत हथियार भी रखे गए है। चूंकि अमेरिका का स्टेल्थ बमवर्षक परमाणु मिसाइले दाग सकता है, इसलिए द्विीप पर परमाणु हथियार रखे जाने की भी संभावना है।
मॉरीशस का हिस्सा है द्वीप
ब्रिटेन ने 1966 में अमेरिका को एक प्रमुख सैन्य सुविधा के लिए 50 साल का पट्टा दिया था, जिसे 2016 में 20 साल के लिए और बढ़ा दिया गया था। मॉरीशस के साथ 2025 के संप्रभुता समझौते को अंतिम रूप दिए जाने से पहले यह विस्तार 2036 में समाप्त होने वाला था। 2019 में, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने फैसला सुनाया कि ब्रिटेन द्वारा मॉरीशस से चागोस द्वीप समूह को अलग करना अवैध था और द्वीपों को वापस लौटाने की सिफारिश की।
मई, 2025 मे एक तरह का समाधान तब हुआ जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित करने वाले एक औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए और डिएगो गार्सिया को अगले 99 वर्षों के लिए 101 मिलियन पाउंड प्रति वर्ष के किराए पर ब्रिटेन को तुरंत पट्टे पर दे दिया गया।
क्रेडिट- जागरण रिसर्च
