कुआलालंपुर/पुलाऊ उजोंग। दक्षिण एशिया के दो देशों में रेत को लेकर तनाव छिड़ सकता है। यह सुनकर आपका चौंकना लाजमी है। लेकिन, यह सच है। दरअसल, जिन दो देशों की बात यहां पर की जा रही है वो मलेशिया और सिंगापुर हैं। आगे बढ़ने से पहले यहां पर जरूरी है कि पहले आपको इन दो देशों के बारे में थोड़ी जानकारी दे दी जाए। 

दोनों देशों पर एक नजर
मलेशिया करीब 330,803 वर्ग किमी में फैला है। इसके दो हिस्‍से हैं जिनमें से एक प्रायद्वीपीय मलेशिया और दूसरा पूर्वी मलेशिया या मलेशियाई बोर्नियो कहलाता है। प्रायद्वीपीय मलेशिया की समुद्री सीमाएं थाईलैंड, सिंगापुर, वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ लगती हैं तो वहीं पूर्वी मलेशिया की सीमा ब्रुनेई, इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के साथ मिलती हैं। मलेशिया की गिनती दुनिया के 44 वें सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में होती है। जहां तक सिंगापुर की बात है तो यह देश मलेशिया से कहीं छोटा है। सिंगापुर महज 722.5 वर्ग किमी में फैला है। सिंगापुर को एजूकेशन का हब होने के साथ वर्ल्‍ड स्‍मार्टेस्‍ट सिटी, इंटरनेशनल मीटिंग सिटी और वर्ल्‍ड सेफेस्‍ट सिटी का तमगा हासिल है। अर्थव्‍यवस्‍था की बात करें तो यह अमेरिका और हांगकांग को टक्‍कर दे रहा है। लेकिन, इसको और अधिक मजबूती देने के लिए सिंगापुर के सामने जमीन की दिक्‍कत आ रही है। मलेशिया से तनाव की मूल वजह भी यही है।

मलेशिया के रेत पर सिंगापुर बढ़ा रहा सीमा
दरअसल, अर्थव्‍यवस्‍था को और अधिक गति देने के लिए जो जमीन सिंगापुर को चाहिए उसको हासिल करने के मकसद से वह समुद्र में रेत डालकर अपनी सीमाओं को बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए उसको रेत की जरूरत होती थी जिसकी सप्‍लाई मलेशिया से की जा रही थी। बीते कुछ समय से सिंगापुर लगातार समुद्र में रेत डालकर अपनी जमीन के विस्‍तार को गति देने में लगा हुआ था। सिंगापुर के सरकारी आंकड़े इसकी तसदीक खुद करते हैं। इनके मुताबिक वर्ष 2018 में सिंगापुर ने करीब 2.7 वर्ग किमी का दायरा बढ़ा लिया है जो एक दशक में सर्वाधिक विस्तार है। लेकिन सिंगापुर की इसी मंशा पर अब मलेशिया ने रेत निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर ग्रहण लगा दिया है। इससे सिंगापुर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और साथ ही यह रेत दोनों देशों में तनाव की एक बड़ी वजह बन सकता है।

मलेशिया के फैसले से परेशानी में सिंगापुर
कुआलालंपुर के अधिकारी इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि सिंगापुर अपनी सीमाओं में वृद्धि कर रहा है। इसके अलावा वह ये भी मानते हैं कि समुद्री रेत के लिए सिंगापुर का सबसे बड़ा नजदीकी स्रोत मलेशिया है। सिंगापुर के बढ़ते कदमों की आहट ने मलेशिया को परेशानी में डाल दिया है। वहीं जानकारों का भी कहना है कि सिंगापुर अपनी जिन महत्‍वाकांक्षी परियोजनाओं को विस्‍तार देने की कोशिश कर रहा है वह उनके लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं। इस कदम से सिंगापुर को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। सिंगापुर के लिए एक समस्‍या ये भी है कि यदि वह रेत का आयात भारत से करता है तो यह उसके लिए काफी महंगा साबित होगा। इसलिए भारत से भी
उम्‍मीद कम ही है। 

मेगा पोर्ट प्रोजेक्‍ट आपको बता दें कि सिंगापुर में दुनिया का सबसे व्‍यस्‍तम ट्यूस कंटेनर पोर्ट है। रेत के जरिए अपनी विस्‍तार योजना को नए आयाम देने वाले सिंगापुर की भावी योजनाओं में ट्यूस मेगा पोर्ट का विकास भी शामिल है। टयूस मेगा पोर्ट प्रोजेक्‍ट अलग-अलग चरणों में 2040 तक पूरा होगा। इसका पहला चरण 2021 में पूरा होगा जिस पर करीब 1.8 अरब डॉलर की लागत आएगी। यह 383 फुटबॉल मैदान के बराबर होगा। आपको यहां पर ये भी बताना जरूरी होगा कि 1965 में आजादी मिलने के बाद से सिंगापुर ने तटीय क्षेत्रों को रेत से भर कर अपने भू-भाग में एक चौथाई की वृद्धि की है।

मलेशिया से पहले इंडोनेशिया भी लगा चुका प्रतिबंध
मलेशियाई प्रधान मंत्री मोहम्मद महाथिर ने पिछले वर्ष अक्टूबर में ही समुद्री रेत के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। सिंगापुर ने इस कदम के लिए मलेशिया की आलोचना भी की थी। ऐसा करते हुए महाथिर ने अपनी उस परेशानी को सार्वजनिक किया था। उनका कहना था कि उनकी रेत का इस्तेमाल अमीर पड़ोसी देश अपना आकार बढाने के लिए कर रहा है। उनकी चिंता सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी। उन्‍होंने यह भी कहा कि सिंगापुर के इस खेल का मलेशियाई अधिकारी और व्‍यवसायी लाभ उठा रहे हैं। इससे पहले इंडोनेशिया ने पर्यावरण संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए 2007 में सिंगापुर में निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। रेत निर्यात की वजह से इंडोनेशिया में निर्माण कार्य लगभग ठप्‍प हो गए थे। 

रेत पर रोक की वजह
मलेशियन पीएम के प्रेस सचिव ने उनके इस फैसले की पुष्टि तो की लेकिन इस बात से इनकार किया कि इसका उद्देश्य सिंगापुर की विस्तार योजनाओं पर अंकुश लगाना है। उनके मुताबिक यह फैसला अवैध रेत तस्करी पर रोक लगाने के मकसद से लिया गया है। मलेशिया खुद इस बात से भी इनकार नहीं करता है कि इससे दोनों देशों के बीच संबंध खराब भी हो सकते हैं। वहीं, दूसरी ओर सिंगापुर ने रेत निर्यात पर लगे प्रतिबंध पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है।

सिंगापुर की योजना
मलेशिया की तरफ से लगे रेत पर प्रतिबंध के बाद सिंगापुर इस पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है। सिंगापुर की समस्‍या एक ये भी है कि यदि अपनी योजनाओं को नया आयाम देने के लिए वह दूसरे देशों से रेत का आयात करता है तो यह उसको बहुत महंगा पड़ता है। सिंगापुर सरकार और व्‍यापारी भी मानते हैं कि मलेशिया के फैसले का असर फिलहाल ज्‍यादा इसलिए भी नहीं पड़ेगा, क्‍योंकि इस बीच में रेत का काफी आयात किया गया है। यदि लंबे समय तक यह प्रतिबंध रहता है तो दिक्‍कत हो सकती है। वहीं यदि इस पर निर्भरता को कम कर दिया जाता है तो भी उनकी परेशानी कम हो सकती है।

क्‍या कहता है यूएन का डाटा
यहां पर खास ये भी है कि रेत का कोई अंतरराष्ट्रीय मूल्य नहीं है। समुद्री रेत की बात करें तो इसका उपयोग फिर से जमीन रिक्लेम करने के लिए किया जाता है। वहीं नदी से निकलने वाली रेत का इस्तेमाल सीमेंट जैसे निर्माण सामग्री के साथ किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के कॉमट्रेड डाटा के अनुसार सिंगापुर ने 34.70 करोड़ डॉलर की लागत पर 2018 में मलेशिया से 590 लाख टन रेत का आयात किया, जो दोनों देशों के सीमा शुल्क कार्यालयों द्वारा प्रदान की गई जानकारी पर आधारित है। यह सिंगापुर के कुल रेत आयात का 97 फीसद और मलेशिया की वैश्विक रेत बिक्री का 95 फीसद है।

क्‍या कहते हैं जानकार
जानकारों की मानें तो सिंगापुर पहले ही अपने तटीय क्षेत्र का इस्तेमाल कर चुका है। अब आगे विकास करने के लिए समुद्र की गहराई को रेत से भरना होगा। इसके लिए सिंगापुर को अधिक रेत या पोल्डर्स और वेरी लार्ज फ्लोटिंग स्ट्रक्चर्स जैसे नए तरीकों की आवश्यकता होगी। है।

कभी एक ही थे सिंगापुर और मलेशिया
आपको बता दें कि कभी ये दोनों देश ब्रिटिश शासित मलाया का हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन, 1965 में अलग-अलग देश बन गए। देश के परिसीमन और साझेदारी वाले संसाधनों, जैसे पानी पर विवादों के कारण दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव होते रहे हैं।

एशियाई देशों के 'अब बस' कहने से पश्चिमी देशों के सामने शुरू होने वाली है परेशानी, ये है मामला  

Posted By: Kamal Verma

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप