काबुल, एजेंसी। अफगानिस्‍तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती सरकार के गठन को लेकर थी। हालांकि, तालिबान ने जिस तरह से सरकार के गठन में विलंब किया और उसकी तीथि को आगे बढ़ाया उससे यह अंदाजा लगाया गया कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसके बाद यह समाचार आया कि हक्‍कानी नेटवर्क समूह के लड़ाकों से हुई झड़प में मुल्‍ला अब्‍दुल गनी बारादर जख्‍मी हो गए। मीडिया में उनके मौत की खबर चलाई गई। इस बीच बीबीसी एक रिपोर्ट्स में यह खुलासा किया है कि सरकार गठन के वक्‍त बरादर और हक्कानी नेटवर्क के एक मंत्री और वरिष्ठ नेता खलील-उर-रहमान हक्कानी सत्ता के बंटवारे को लेकर तीखी बहस हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक एक अज्ञात वरिष्ठ तालिबान अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि तालिबान के अंतरिम मंत्रिमंडल के गठन को लेकर पिछले सप्ताह काबुल में राष्ट्रपति भवन में दोनों नेताओं के बीच बहस हुई थी।

कौन है हक्‍कानी नेटवर्क

  • अफगानिस्‍तान में हक्कानी गुट का काफी प्रभाव है। एक समय अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए का समर्थन हासिल था, उस वक्‍त यह गुट पूर्व सोवियत संघ के खिलाफ लड़ रहा था। हालांकि, बाद में हक्कानी नेटवर्क बड़ा पश्चिम विरोधी गुट बनकर उभरा। हक्कानी गुट पर आरोप है कि अफगानिस्तान में सरकारी, भारतीय और पश्चिमी देशों के ठिकानों पर उसने कई बड़े हमले किए हैं।
  • पाकिस्तानी अधिकारी हक्कानी नेटवर्क को मुख्यत अफगान चरमपंथी गुट बताते हैं। लेकिन इसकी जड़े पाकिस्तान के अंदर तक फैली हैं। पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र में कुछ लोगों में इसकी खास पैठ है। हक्कानी नेटवर्क के मुखिया जलालुद्दीन हक्कानी है। उन्होंने 80 के दशक में उत्तरी वजरिस्तान से पूर्व सोवियत संघ के सैनिकों के खिलाफ अभियान चलाया था। कई अमरीकी अधिकारियों का दावा है कि उस समय जलालुद्दीन हक्कानी सीआईए के लिए काफी अहम और खास थे।
  • हक्‍कानी गुट के लड़ाके पाकिस्तानी की आइएसआइ के भी पसंदीदा कमांडर थे। उस वक्‍त खुफ‍िया पाक एजेंसी यह तय करती थी कि पूर्व सोवियत संघ से लड़ने के लिए किस कमांडर को कितना पैसा और हथियार मिलेंगे। पश्चिमी देशों और पाकिस्तान में बहुत से लोग अब भी मानते हैं कि पाकिस्तान के कुछ शक्तिशाली लोगों की रणनीतिक और दूसरी तरह की मदद के बगैर हक्कानी नेटवर्क की पहुंच कम होगी। वजीरिस्तान को हक्कानी नेटवर्क ने अपना गढ़ बनाया है। वजीरिस्तान स्थित चरमपंथियों की बढ़ती ताकत को ही अफगानिस्तान में अमरीका की खराब हालत का कारण माना जाता है।

बरादर की गोली लगने से मौत की खबर गलत

सोमवार को तालिबान में सत्ता में शीर्ष पदों के लिए आपसी खींचतान के बीच कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि मुल्‍ला अब्‍दुल गनी बरादर गोली लगने से मौत हो गई है। यह कहा जा रहा था कि पद को लेकर तालिबान नेताओं के बीच विवाद गहरा गया है। इसके बाद बरारद का एक आडियो क्लिप सामने आया है। इस क्लिप में कहा गया है कि मेरे गायब रहने के दौरान मीडिया एक्टिविस्‍ट ने प्रोपेगैंडा फैलाया है। बता दें कि अफगानिस्‍तान की नई सरकार में बरादर को डिप्‍टी प्रधानमंत्री नियुक्‍त किया गया है। यह दावा किया गया था कि तालिबान गुटों के बीच सत्‍ता को लेकर संघर्ष की वजह से बरादर की मौत हो गई है।

इसके बाद बरादर ने अपना आडियो क्लिप जारी किया है। इस क्लिप में बरादर ने इन बातों को सिरे से खारिज कर दिया है। सामने आए आडियो क्लिप में उन्‍होंने कहा कि मैं यात्रा पर था। मेरे मौजूद नहीं रहने का फायदा उठाकर मीडिया एक्टिविस्ट ने प्रोपेगैंडा फैलाना शुरू कर दिया है। मैं और मेरा हर साथी पूरी तरह से ठीक हैं। खबरों ने हमेशा प्रोपेगैंडा फैलाने का काम किया है। इन अफवाहों को सिरे से खारिज करें, हम सब ठीक हैं। उन्होंने कहा कि जब दुश्मनों को सफलता नहीं मिली तो वे हमसे लड़े और मेरी मौत की खबरें फैला दीं। लेकिन हर दूसरे क्षेत्र की तरह यहां भी उन्हें हार मिली।

 

Edited By: Ramesh Mishra