नेपाल बाढ़ का 11 साल पुराने कनेक्शन का खुलासा, विनाशकारी तबाही का असली कैलकुलेशन
नेपाल की भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में 26 अगस्त को आई विनाशकारी आपदा, जिसमें 1300 से अधिक लोगों की ...और पढ़ें

जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियर पिघलने का सच (फोटो-रॉयटर्स)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, काठमांडू। 26 अगस्त को नेपाली की भोटे कोशी और त्रिशूली नदी में आई विनाशकारी आपदा ने पूरी दुनिया का ध्यान हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते पर्यावरण की ओर खींचा है। लांगटांग लिरुंग चोटी से अचानक गिरे 110 मिलियन क्यूबिक मीटर चट्टान और बर्फ के मलबे ने निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई।
इस त्रासदी में 1,300 से ज्यादा लोगों की जान चली गई और हजारों लोग लापता हो गए।
अक्सर किसी प्राकृतिक आपदा के पीछे कोई एक तात्कालिक कारण दिखाई देता है, लेकिन इस तबाही की परतें काफी गहरी हैं। वर्ल्ड वेटर एट्रिब्यूशन के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि यह त्रासदी किसी एक वजह से नहीं, बल्कि दशकों से बन रही परिस्थितियों, भूवैज्ञानिक संरचना और मानव-जनित जलवायु परिवर्तन की एक गंभीर श्रृंखला का परिणाम थी।
क्या थी नेपाल आपदा की मुख्य वजहें?
दशकों से बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण लैंगटांग-लिरुंग ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहा था। 1815 में जो ग्लेशियर 18.9 वर्ग किलोमीटर में फैला था, वह अगस्त 2026 तक घटकर महज 7.34 वर्ग किलोमीटर रह गया। ग्लेशियर के पीछे हटने से चट्टानी दीवार बेसहारा हो गई, जिसे इसने सदियों से थाम रखा था।
ऊंचे पहाड़ों की दरारों में जमी हुई बर्फ (पर्माफ्रॉस्ट) एक कुदरती गोंद की तरह चट्टानों को आपस में बांधकर रखती है। तापमान बढ़ने से यह पर्माफ्रॉस्ट पिघलने लगा, जिससे चट्टानों की पकड़ कमजोर पड़ गई।
अध्ययन के अनुसार, यह ढहने की घटना उसी क्षेत्र में हुई जहां नेपाल और पर्माफ्रॉस्ट सबसे तेजी से पतला हो रहा है।
2915 में आए 7.8 तीव्रता वाले विनाशकारी भूकंप ने इस पहाड़ी ढलान को आंतरिक रूप से कमजोर कर दिया था। हालांकि भूकंप के तुरंत बाद ढलान नहीं गिरी, लेकिन इसने ढलान को ढहने की कगार पर पहुंचा दिया था।
इसके साथ ही बारिश और बर्फबारी के पैटर्न में भी बदलाव आया है। जहां पहले बर्फ गिरती थी, वहां अब बारिश हो रही है, जिससे पानी दरारों में जाकर चट्टानों को अलग कर रहा है। इसके साथ ही असाधारण गर्मी भी एक बड़ा कारण है।
तबाही का घटनाक्रम और असर
सैटेलाइट आंकड़ों के अनुसार, लगभग 5,150 मीटर की ऊंचाई से चट्टान और ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर 1,400 मीटर नीचे गिरा। इसके गिरने से निकली ऊर्जा 5.2 तीव्रता वाले भूकंप के बराबर थी।
नीचे गिरते समय घर्षण से बर्फ पिघली और यह मलबा ल्हेंडे खोला नदी में पहुंचकर एक भयानक बाढ़ में बदल गया।
मात्र 7 से 8 मिनट में इस मलबे और पानी के तेज बहाव ने 20 किलोमीटर की दूरी तय की और नदी के संगम पर इतनी जोर से टकराया कि पानी दो किलोमीटर पीछे चीनी क्षेत्र की ओर चला गया। इस बाढ़ ने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, बस्तियों और कृषि भूमि को पूरी तरह तबाह कर दिया।
पता लगने पर भी नहीं मिलता पर्याप्त समय
WWA की रिपोर्ट में यह बात हाईलाइट की गई है कि यह आपदा पारंपरिक नदी बाढ़ पूर्वानुमान प्रणालियों की सीमाओं से परे थी।
जिस गति और पैमाने पर यह तबाही आई, उसमें अगर कोई शुरुआती अलर्ट सिस्टम ढलान खिसकने का पता लगा भी लेता, तो भी लोगों के पास सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए केवल 7 से 8 मिनट का समय होता, जो बड़े पैमाने पर लोगों को निकालने के लिए काफी नहीं था।
