पेरिस, एएफपी। प्राकृतिक गैसों का उपयोग बढ़ने से इस वर्ष वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। यह हालात तब हैं जब कई देशों ने कोयले की खपत कम करने के साथ-साथ जलवायु आपातकाल की घोषणा की है। एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट ने अपने सालाना विश्लेषण में कहा कि रसोई और वाहनों में प्रयुक्त होने वाली प्राकृतिक गैसों के कारण इस साल कार्बन का उत्सर्जन 0.6 फीसद बढ़ा है। हालांकि पिछले साल की तुलना में यह आंकड़ा कम है लेकिन हमें ग्लोबल वार्मिंग के प्रति सचेत रहने की जरूरत है।

तीन वैश्विक अध्ययनों में लेखकों ने उत्सर्जन में वृद्धि के लिए प्राकृतिक गैस और तेल को जिम्मेदार ठहराया है। इसका एक अर्थ यह भी है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में कोयले के उपयोग में गिरावट आने लगी है। कार्बन बजट रिपोर्ट के लेखक और ईस्ट एंग्लिया यूनिवर्सिटी के कॉरिन ले क्वेर ने कहा, ‘यह तो सब जानते हैं कि कोयले के उपयोग में उतार-चढ़ाव से वैश्विक स्तर पर जलवायु में परिवर्तन आते हैं, लेकिन तेल और विशेष रूप से प्राकृतिक गैस का उपयोग बढ़ने भी कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हुई है।’ उन्होंने कहा कि हाल के दशकों में वायुमंडलीय में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर तेजी से बढ़ा है, इस वर्ष औसतन 410 पीपीएम (पाट्र्स पर मिलियन) फैलने का अनुमान है। यह स्तर 80 लाख साल में सबसे उच्चतम है।

उत्सर्जन को 7.6 फीसद कम करने की जरूरत

क्वेर ने कहा, ‘यह रिपोर्ट मैड्रिड में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की जलवायु वार्ता में एकत्रित होने वाले प्रतिनिधियों को असहज कर सकती है। दुनिया के शीर्ष जलवायु वैज्ञानिकों की चेतावनी पर हमें समय रहते काम करने की जरूरत है। पिछले सप्ताह यूएन ने कहा था कि वैश्विक उत्सर्जन को हर साल 7.6 फीसद कम करने की जरूरत है। ताकि वर्ष 2030 तक तापमान को 1.7 डिग्री सेल्सियस (2.6 फॉरनहाइट) तक स्थिर किया जा सके।

2010 में दर्ज की गई थी रिकॉर्ड गर्मी

औद्योगिक क्रांति के बाद अब तक एक डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा है। इसके कारण भीषण तूफान, सूखा, जंगलों में आगजनी और बाढ़ की घटनाएं बढ़ गई हैं और जलवायु परिवर्तन और ज्यादा तेज हो गया है। यूएन ने कहा कि 21 सदी के पहले दशक में वर्ष 2010 में रिर्काड गर्मी दर्ज की गई थी और इस साल गर्मी से लगभग 2.2 लाख लोग प्रभावित हो सकते हैं।

लो कार्बन टेक्नोलॉजी का बढ़ावा देने की जरूरत

इस अध्ययन के लेखकों ने बताया कि 2019 में हुई उत्सर्जन में वृद्धि पिछले दो वर्षों की तुलना में धीमी है। फिर भी ऊर्जा की मांग इस बात की ओर इशारा करती है कि पवन और सौर ऊर्जा जैसी लो कार्बन टेक्नोलॉजी के प्रयोग को और ज्यादा बढ़ाने की जरूरत है। वर्ष 2015 की तुलना में इस साल चार फीसद अधिक उत्सर्जन हुआ है। तापमान में वृद्धि को सीमित करने के लिए 195 देशों ने पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में इस समझौते से अमेरिका ने खुद को अलग कर लिया था।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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