नई दिल्ली, आइएएनएस। श्रीलंका के बाद अब मालदीव भी चीन के कर्ज के जाल में फंस गया है। महज 5.7 अरब डॉलर (करीब 40 हजार करोड़ भारतीय रुपये) की जीडीपी वाले इस द्वीपीय देश पर 1.4 अरब डॉलर (करीब दस हजार करोड़ रुपये) का चीन का कर्ज है। भारत से मालदीव की बढ़ती नजदीकी देख चीन ने उस पर ब्याज की दर भी बढ़ा दी है और कर्ज की मांग भी शुरू कर दी है। कोरोना काल में चीन की इस हरकत से मालदीव परेशान है। भारत में भी उसकी कठिनाई कम करने पर विचार हो रहा है।

पर्यटन पर टिकी मालदीव की अर्थव्‍यवस्‍था

हिंद महासागर के मध्य स्थित मालदीव की आय का सबसे बड़ा स्रोत पर्यटन है। यहां की करीब 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से विदेश से आने वाले पर्यटकों पर निर्भर है। कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते पिछले छह महीने से यहां पर पर्यटकों का आवागमन बंद है। इससे इस छोटे से देश की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है। मालदीव का दूसरा बड़ा कारोबार मछली से जुड़ा हुआ है, बाकी स्थानीय कारोबार हैं।

विश्‍व बैंक ने भी चीन की आलोचना

विश्व बैंक के मुताबिक, पर्यटन का मालदीव की अर्थव्यवस्था में 28 फीसद का बड़ा योगदान है, जबकि 60 फीसद विदेशी मुद्रा उसे पर्यटकों से मिलती है। ऐसे में कोरोना काल में मालदीव को कितना बड़ा नुकसान हो रहा है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। मुश्किल के वक्त में चीन भी इस छोटे से देश के साथ धूर्तता से बाज नहीं आ रहा। चीन ने उसे आसान शर्तों पर दिए गए ऋण की ब्याज दर 1.5 फीसद से बढ़ाकर 2.0 फीसद कर दी है। वहीं, सरकार की गारंटी पर दिए गए कर्ज की ब्याज दर छह प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दी है। इतना ही नहीं, चीन ने उसे एक करोड़ डॉलर (करीब 74 करोड़ रुपये) का कर्ज तुरंत चुकाने का नोटिस भी दे दिया है।

ड्रैगन के जाल से निकलने की कोशिश कर रहा मालदीव

मालदीव ने ये सारे कर्ज पूर्व की अब्दुल्ला यामीन सरकार के समय लिए थे। उस समय यामीन से दोस्ती दिखाकर चीन ने मालदीव की आधारभूत सुविधाओं के लिए कर्ज दे दिया और छोटे से देश को फंसा लिया। अब मालदीव कर्ज के जाल से निकलने की कोशिश कर रहा है।

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