बर्लिन। अमेरिका, इस्राएल, सऊदी अरब समेत कुछ अन्‍य देशों के बाद अब जर्मनी ने भी लेबनान के आतंकी संगठन हिजबुल्लाह पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। ये प्रतिबंध देश में इस आतंकी संगठन द्वारा हमले कराए जाने की आशंका के मद्देनजर लगाया गया है। देश के गृह मंत्री होर्स्ट जेहोफर का कहना है कि हिजबुल्‍लाह के आतंकी जर्मनी में आपराधिक गतिविधियां कर रहे हैं और हमलों की योजनाएं भी बना रहे हैं। आपको बता दें कि इस फैसले से पहले जर्मनी ने इस संगठन की सैन्य गतिविधियों पर ही रोक लगा रखी थी। इसकी वजह से ये राजनीतिक रूप से यहां पर सक्रिय था। वहीं ईरान ने जर्मनी को इस कदम के लिए चेताया है कि उसको इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ईरान का कहना है कि ये कदम इजराइल और अमेरिका के दबाव में उठाया गया है।

माना जा रहा है कि जर्मनी के इस कदम से यूरोपीय संघ पर भी इसको प्रतिबंधित करने का दबाव बढ़ जाएगा। अमेरिका और इजराइल ने जर्मनी के इस कदम की सराहना की है। ये दोनों देशों ने बहुत पहले ही हिजबुल्लाह को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। इजराइल ने जहां जर्मनी के इस कदम को आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जंग में एक महत्वपूर्ण बताया है वहीं अमेरिका ने इससे यूरोपीय संघ को सीख लेने की नसीहत दे डाली है।

एएफपी के मुताबिक इस संगठन को प्रतिबंधित करने के साथ ही देश भर में इसके कई ठिकानों पर छापेमारी भी की गई है। गृह मंत्री होर्स्ट जेहोफर का कहना है कि हिजबुल्लाह एक आतंकदी संगठन है जो दुनिया भर में कई हमलों और अपहरणों के लिए जिम्मेदार है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्विटर पर लिखा है कि संकट के इस दौर में भी कानून का शासन जारी रहना चाहिए। जर्मन की सुरक्षा एजेंसियों को शक है कि इस संगठन के करीब एक हजार सदस्य देश में मौजूद हैं। ये जर्मनी का इस्तेमाल एक सुरक्षित जगह के रूप में करते आए हैं जहां ये योजना बनाते हैं, नए सदस्य खोजते हैं और आपराधिक गतिविधियों के जरिए धन जमा करते हैं। आपको बता दें कि यूरोपीय संघ ने लंबी चर्चा के बाद 2013 में इसके सैन्य अंग को आतंकी घोषित किया था।

आपको बता दें कि हिजबुल्‍लाह की शुरुआत लेबनान में उस वक्‍त शुरू हुई थी जब 1943 में एक समझौते के तहत ये तय किया गया था कि देश में केवल एक सुन्नी मुसलमान ही प्रधानमंत्री बन सकता था। इसके अलावा ईसाई राष्ट्रपति और संसद का स्पीकर शिया मुसलमान हो सकता है। लेकिन ये समझौता लंबे समय तक नहीं चल पाया। धीरे-धीरे लेबनान में फिलिस्‍तीन से आए सुन्नी मुसलामानों की संख्या बढ़ती चली गई और शिया मुसलामानों को अपने हाशिये पर जाने का डर सताने लगा। इसाई यहां पर पहले से ही अल्‍पसंख्‍यक थे। इस डर की वजह से 1975 में लेबनान में 15 वर्ष तक चलने वाले गृह युद्ध की शुरुआत हुई।

1978 में इजराइल ने लेबनान के दक्षिणी हिस्से पर कब्जा कर लिया था। इस इलाके का इस्‍तेमाल इससे पहले फिलिस्‍तीनी इजरायल पर हमले के लिए किया करते थे। इस बीच ईरान में सत्‍ता परिवर्तन हुआ जिसका फायदा लेबनान ने उठाने की कोशिश की और शिया मुसलामानों पर प्रभाव डालना शुरू किया। 1982 में लेबनान में हिजबुल्लाह नाम का एक शिया संगठन बना जिसका मतलब था अल्लाह की पार्टी। इजराइल के खिलाफ हमलों के लिए ईरान ने इसको फंडिंग में मदद की। इसकी बदौलत केवल तीन साल के अंदर ये एक बड़ा गुट बनकर सामने आया।

हिजबुल्‍लाह ने 1985 में इसने अपना घोषणापत्र जारी किया जिसमें लेबनान से सभी पश्चिमी ताकतों को निकाल बाहर करने का एलान किया गया। इसमें अमेरिका और सोवियत संघ दुश्मन घोषित किया गया। इसके अलावा इसमें इजराइल को तबाह करने की भी बात कही गई थी। इस वक्‍त तक हिजबुल्लाह देश की राजनीति सक्रिय होने लगा था। 1992 के चुनावों में इसे आठ सीटों पर जीत मिली। 90 के दशक ने अंत तक यह सैकड़ों लोगों की जान ले चुका था। 1997 में अमेरिका ने इसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया था।

वर्ष 2000 में इजराइली सैनिकों की लेबनान से वापसी के बाद भी इनके बीच तनाव खत्म नहीं हुआ। 2011 में इस गुट ने सीरिया में राष्‍ट्रपति बशर अल असद के समर्थन में हजारों लड़ाके भेजे। धीरे-धीरे हिजबुल्लाह लेबनान में और मजबूत होता गया और आज ये देश की एक अहम राजनीतिक पार्टी है। दुनिया के कई देश इसे आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं।

 

Posted By: Kamal Verma

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