नूर सुल्तान, एएनआइ: कजाखस्तान में हाल के दिनों की भीषण हिंसा और सरकार के विरोध के पीछे एलपीजी की कीमत में वृद्धि से उपजा गुस्सा नहीं बल्कि उसकी आड़ में अशांति पैदा कर सत्ता पर कब्जे की साजिश थी। लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस महंगी होने का विरोध देश के दक्षिण-पश्चिम इलाके से शुरू हुआ और कुछ ही घंटों में अन्य शहरों में फैल गया। सबसे ज्यादा हिंसा देश के सबसे बड़े शहर अलमाटी में हुई। हिंसा फैलाने के लिए पूरे देश में पहले से तैयारी करके रखी गई थी। यह बात हिंसा में लिप्त लोगों के पकड़े जाने और उनसे पूछताछ में पता चली है।

महंगाई के विरोध की बनाई गई

रूपरेखा इस सुनियोजित षडयंत्र की सबसे बड़ी बात यह थी कि लोगों को भ्रमित करने के लिए महंगाई के विरोध की रूपरेखा बनाई गई, जैसे ही लोग इसके लिए सड़कों पर आए-वैसे ही उन्हें आगे करके सरकारी संपत्ति पर हमले शुरू कर दिए गए। एक के बाद सरकारी इमारतें जलाई जाने लगीं, सरकारी और निजी संपत्ति की लूटपाट होने लगी और सरकारी कार्यालयों पर कब्जे होने लगे। फायरिंग और आगजनी से अस्पतालों को भी नहीं छोड़ा गया। वहां भर्ती मरीजों पर दया नहीं की गई। सरकारी एजेंसियां जब तक कुछ समझ पातीं तब तक देश के ज्यादातर शहरों में हालात बेकाबू हो चुके थे। दो जनवरी को दूरस्थ झानाओजेन और अक्ताऊ में शुरू हुआ आंदोलन और हिंसा महज दो दिन में हजारों किलोमीटर दूर अलमाटी पहुंच गई। इसी गति से हिंसा अन्य शहरों में फैली।

हिंसा के जरिये सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश

महंगाई के विरोध में आंदोलन कर रहे कुछ लोग कजाख भाषा भी नहीं जानते थे। लेकिन वे हथियारों से लैस और उन्हें चलाने में पूरी तरह से प्रशिक्षित थे। उन्होंने बड़े योजनाबद्ध तरीके से अपना काम किया और आगे बढ़ते गए। इसी का नतीजा था कि शुरुआती दौर में पुलिस और सुरक्षा बल उनके आगे लाचार हो गए। इसके बाद जब राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने आपातस्थिति की घोषणा की और रूस के नेतृत्व वाली मित्र देशों के सैनिकों को बुलाया, तब हालात काबू में आने शुरू हुए। इसके बाद हिंसा में शामिल लोगों को बिना चेतावनी दिए मार गिराने के निर्देश दिए गए। दस हजार से ज्यादा हिंसक लोगों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार लोगों से पूछताछ में पता चला है कि दो करोड़ से कम आबादी वाले देश में 20 हजार प्रशिक्षित हथियारबंद लोगों ने हिंसा के जरिये सत्ता पर कब्जे की रणनीति बनाई थी।

Edited By: Amit Singh