नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। हाथी तो हम सभी ने देखा होगा और सूड़ से उसे खुद के ऊपर पानी और कीचड़ डालते हुए भी देखा होगा, लेकिन यह नहीं जानते कि वह ऐसा क्यों करता है? स्विटजरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ जेनेवा और स्विस इंस्टीट्यूट ऑफ बॉयोइंफार्मेटिक्स के वैज्ञानिकों ने इस गुत्थी को सुलझाने का दावा किया है। प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक हाथी को कुदरत ने चमत्कृत करने वाली त्वचा प्रणाली दी है। जिसकी मदद से वह खुद के शरीर को शीतल रखता है।

खास है त्वचा

विशालकाय आकार के साथ गर्म व शुष्क स्थानों पर रहने वाले हाथी की त्वचा झुर्रीदार और गहरी दरारों से युक्त होती है। चूंकि इंसानों की तरह इस जानवर के पास पसीने की ग्रंथि नहीं होती है जिससे कि ये खुद का तापमान नियंत्रित कर सके। लिहाजा ये गुण इस जीव के क्रमिक विकास के दौरान विकसित हुए। जब इस दरार युक्त त्वचा पर पानी पड़ता है तो वह दरारों के जाल से होता हुआ पूरे शरीर पर फैल जाता है। किसी सपाट त्वचा के

मुकाबले इस पर पानी पांच से दस गुना ज्यादा समय तक रुकता है। बाद में वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के तहत हाथी खुद के शरीर को शीतल करता रहता है।

तापमान नियंत्रण के तरीके

जीवों के क्रमिक विकास के दौरान उनके तापमान नियंत्रण के अलग अलग तरीके विकसित हुए। कुछ जानवर पसीना निकालकर अपने शरीर का तापमान नियंत्रित करते हैं तो कुछ की रक्त शिराएं चौड़ी होती हैं। कुछ तो जल्दी-जल्दी सांस लेकर ऐसा करने में सक्षम होते हैं।

ऐसे किया अध्ययन

वैज्ञानिकों ने हाथी की त्वचा का कंप्यूटर मॉडल विकसित करके पता लगाया कि जब भी कोई यांत्रिक तनाव पड़ता है तो इसकी बाहरी त्वचा यानी एपीडर्मिस पर ये दरारें उभर आती हैं। जैसे हाथी जब चलता है तो त्वचा पर ये दरारें बन जाती हैं। हाथी का शरीर तापमान नियंत्रण में नाटकीय असर डालता है। दरअसल जिस जीव का शरीर जितना बड़ा होगा, उसे तापमान नियंत्रण में उतनी ही मुश्किलें आएंगी। जब जानवर का शरीर वृद्धि करता है तो तुलनात्मक रूप से उसकी त्वचा की सतह का क्षेत्र कम होता जाता है। इसका मतलब है कि इसे आंतरिक तापमान को सामान्य रखने में मुश्किलें अपेक्षाकृत ज्यादा आती हैं। 

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