10 मिनट, 125 गोले और मद्रास पर जर्मन का हमला, जानिए पहले विश्व युद्ध में भारत की क्या थी भूमिका
22 सितंबर 1914 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन क्रूजर SMS एमडेन ने मद्रास पर हमला किया, जिसने 10 ...और पढ़ें

22 सितंबर 1914 को जर्मन क्रूजर एमडेन ने मद्रास पर हमला किया।
HighLights
22 सितंबर 1914 को जर्मन क्रूजर एमडेन ने मद्रास पर हमला किया।
एमडेन ने 10 मिनट में 125-130 गोले दागे, तेल टैंक में आग लगी।
'एमडेन' शब्द तमिल में चतुर/साहसी व्यक्ति का पर्याय बन गया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जुलाई 1914 में जब यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई, तो तमिलनाडु का मद्रास शहर युद्ध के मुख्य मैदानों से हजारो किलोमीटर दूर था। इस बाद भी ब्रिटिश अधिकारियों अंदेशा था कि युद्ध का दायरा केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा।
एक बड़े बंदरगाह के तौर पर शहर की रणनीतिक अहमियत ने इसे खतरे में डाल दिया था, और कुछ ही हफ्तों में, लोगों को सलाह दी जाने लगी कि वे सुरक्षित जगहों या अंदरूनी इलाकों की ओर चले जाएं।
शहर छोड़ने को मजबूर हो गए थे लोग
सितंबर 1914 तक स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि लोगों ने पलायन शुरू कर दिया। मद्रास यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर पी.डी. बालाजी के मुताबिक, रोयापेट्टा में रहने वाले उनके दादा-दादी डर के कारण अपने कीमती सामान के साथ सलेम चले गए थे।
उनका यह डर 22 सितंबर 1914 की रात को हकीकत में बदल गया, जब जर्मन क्रूजर SMS एमडेन मद्रास के तट पर पहुंचा और उसने गोलीबारी शुरू कर दी। यह हमला कुछ ही देर तक चला, लेकिन यह पहले विश्व युद्ध के दौरान भारत के अनुभव की सबसे यादगार घटनाओं में से एक बन गया।
नकली पहचान के साथ आया जर्मन क्रूजर
मद्रास की ओर बढ़ने से पहले ही एमडेन भारतीय उपमहाद्वीप के आस-पास के समुद्री इलाकों में जहाजों पर हमले कर रहा था। लेकिन इस क्रूजर को एक अनोखा फायदा मिला हुआ था कि दूर से देखने पर यह दुश्मन का जहाज यानि जर्मन जहाज जैसा नहीं लगता था।
इतिहासकार वेंकटेश रामकृष्णन ने जानकारी देते हुए बताया कि एमडेन में एक नकली चौथा फनल लगा जिससे यह जर्मन जहाज ब्रिटिश जहाज जैसा दिखता था कुछ दुश्मन जहाजों ने तो सफर के दौरान इसे सलामी भी दी थी।
इस भेष बदलने की वजह से क्रूज़र ऐसे समुद्री रास्तों से गुजर पाया जहां असली जर्मन युद्धपोत होने पर तुरंत सबका ध्यान खिंच जाता।
एक रात में दागे 130 गोले
रात करीब 9:30 बजे एमडेन ने शहर पर बमबारी शुरू कर दी। इतिहासकार वेंकटेश रामकृष्णन के अनुसार कैप्टन कार्ल वॉन मुलर ने किसी एक खास इमारत को निशाना बनाने के बजाय उन सभी इमारतों पर गोले दाग दिये जिन पर लाइटहाउस की रोशनी पड़ रही थी।
कैप्टन ने करीब 10 मिनट के अंदर 125 से 130 गोले दाग दिए। एक गोला बर्मा ऑयल कंपनी के स्टोरेज टैंक पर गिरा जिससे करीब 3,50,000 गैलन तेल में आग लग गई। यह आग तीन दिनों तक जलती रही।
गोले के टुकड़े मद्रास हाई कोर्ट, जनरल अस्पताल, वेपेरी, हैडोज़ रोड, पूनमल्ली हाई रोड और जॉर्ज टाउन तक पहुँचे। नुकसान की जगहें अहम हैं क्योंकि इससे पता चलता है कि कैसे बंदरगाह पर हुआ नौसैनिक हमला तेजी से पूरे शहर के लिए एक बड़ा झटका बन सकता है।
हमले से पहले से चल रहा था पलायन
एमडेन का हमला अचानक नहीं हुआ था। प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद के हफ्तों में मद्रास में चिंता फैल गई थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने लोगों को सलाह दी थी कि वे सुरक्षित जगहों पर चले जाएं क्योंकि उन्हें डर था कि दुश्मन सेना शहर पर हमला कर सकती है।
जब जर्मन क्रूजर ने हमला किया, तब तक लोगों का वहां से जाना शुरू हो चुका था। जो परिवार शहर छोड़कर चले गए थे, उनके लिए यह फैसला अचानक ही बहुत दूर की सोचने वाला साबित हुआ। सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं थी। इसने आम नागरिकों के फैसलों पर भी असर डालना शुरू कर दिया था।
अचानक पीछे हट गया एमडेन
हमला करने के बाद एमडेन ब्रिटिश सेना की किसी भी प्रभावी जवाबी कार्रवाई से पहले ही वहां से गायब हो गया। इतिहासकार वी. दिवाकर के अनुसार, अंग्रेजों का यह दावा गलत था कि एमडेन उनकी जवाबी कार्रवाई के डर से भागा था। एमडेन अपनी दस 10.5 सेमी तोपों और टॉरपीडो से लैस एक शक्तिशाली युद्धपोत था। कैप्टन मुलर ने ठीक उसी समय हमला क्यों रोका, यह आज भी इतिहास का एक अनसुलझा रहस्य है।
भारतीय क्रांतिकारी कनेक्शन का सच
लगातार यह दावे किए जाते रहे हैं कि जर्मनी में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी चेम्पाकारमन पिल्लई एमडेन पर सवार थे और उन्होंने इस हमले की योजना बनाई थी। हालांकि, इतिहासकार वी. दिवाकर के अनुसार, एमडेन के वाइस-कमांडर हेल्मुथ वॉन मुके के दस्तावेजों में पिल्लई का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। मुके ने केवल एक भारतीय यात्री द्वारा जानकारी दिए जाने का जिक्र किया था।
कब आम भाषा का हिस्सा बना एमडेन ?
हालांकि इस हमले का प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम नतीजे पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा, लेकिन इसने भारतीयों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इस घटना के बाद तमिल भाषा और आम बोलचाल में एमडेन शब्द का इस्तेमाल किसी बेहद चतुर, साहसी या डरावने व्यक्ति के संदर्भ में किया जाने लगा। 1914 में ही एमडेन को नष्ट कर दिया गया, लेकिन उसकी यादें और निशानियाँ आज भी मद्रास के इतिहास में दर्ज हैं।
