नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। अपने ड्रोन को मार गिराए जाने के बाद ईरान पर हमला करने जा रहे अमेरिका को एकदम से फैसला बदलना पड़ा। अब अमेरिका ईरान के खिलाफ प्रत्यक्ष की बजाय परोक्ष युद्ध छेड़ चुका है। इसके तहत ईरान के कई सैन्य प्रतिष्ठानों पर अमेरिका ने साइबर हमले किए। ईरान पर सीधा हमला न करने को विशेषज्ञ अमेरिका की विवशता भी बता रहे हैं। अमेरिका के विदेशी मामलों से जुड़े मंत्रालय के सलाहकार रहे एरॉन डेविड मिलर और इसी मंत्रालय में छह प्रशासकों के साथ काम कर चुके रिसर्च सोकोल्सकाई का आकलन है कि अगर दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ ता अमेरिका के लिए यह ठीक नहीं होगा। पेश है एक नजर...

युद्ध का कोई सार्थक अंत नहीं
ट्रंप प्रशासन ने युद्ध के लिए कोई लक्ष्य घोषित नहीं किया है। वैसे भी ईरान एक ताकतवर और बड़ा देश है। आसानी से इसे झुकाया नहीं जा सकता। वहां कोई मजबूत विपक्ष या विपक्षी एकता भी नहीं है जो अमेरिकी हमलों के बाद वहां के शासक को उखाड़ फेंके। एक पल को अगर ऐसा हुआ भी तो जो विकल्प बनेगा, वह और कट्टर अमेरिका विरोधी होगा। वहां के मौजूदा शासक के बारे में यह सोचना भी गलत होगा कि वह अमेरिका के सामने मजबूर होकर उसकी शर्तों पर संधि को राजी होगा। ज्यादा से ज्यादा अमेरिका वहां अस्थिरता पैदा कर सकता है। लेकिन बदले में ईरान अमेरिका के साथ लेबनान, ईराक, यमन, अफगानिस्तान जैसे उसके मित्र देशों के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।

तेल बाजार में उबाल
पश्चिमी एशिया के बिगड़ते हालातों के बीच तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। ओमान की खाड़ी में दो तेल टैंकरों पर हमले की घटना के बाद तेल की कीमतों में वृद्धि भी हुई है। इतना ही नहीं फारस की खाड़ी में तेल का व्यापार करना भी अमेरिकी के लिए आसान और अर्थपूर्ण नहीं होगा। ईरान अपने सैन्य उपकरणों से अभी इतना ताकतवर है कि अमेरिका की तमाम घेराबंदी के बावजूद वह खाड़ी क्षेत्र से भेजे जाने वाले तेल टैंकरों को कभी भी निशाना बना सकता है। उस रास्ते को रोक सकता है।

अलग-थलग पड़ने का डर
कोरिया के साथ 1953 के युद्ध के बाद अमेरिका ने जितने भी युद्ध लड़े उसमें दूसरे देशों को का साथ जरूर लिया। इस समय अगर युद्ध छिड़ता है तो ब्रिटेन, सऊदी अरब, यूएई व इजरायल को छोड़ शायद ही कोई देश साथ दे। रूस और अमेरिका के शुरू से रिश्ते ठीक नहीं रहे। चीन के साथ आर्थिक मोर्चों पर भिडंत जगजाहिर है। ऐसे में ये दोनों बड़े देश दुनियाभर में अमेरिका के खिलाफ माहौल बनाने का मौका नहीं छोड़ेंगे।

एक और युद्ध में फंसना नहीं चाहता अमेरिका
ट्रंप अंतहीन युद्ध से अलग दिशा में चलने वाले राष्ट्रपति हैं। इसे अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी से जोड़कर देखा जा सकता है। कई बार कह भी चुके हैं कि वे अंतहीन युद्ध में संसाधन और समय बर्बाद करने के पक्षधर नहीं है। ईरान से भी उन्होंने युद्ध की बजाय बातचीत की इच्छा पूर्व में कई बार जताई है। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के लिहाज से भी ईरान से खुला युद्ध ट्रंप को अपने विरोधी डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों, निर्दलीयों के आगे कमजोर कर सकता है।

हमला होता तो क्या होता
अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन ने ताजा समीक्षा में कहा है कि ईरान की नौसेना पर अमेरिका दो दिन के अंदर कब्जा कर लेगा। हर मोर्चे पर ईरान को तबाह कर देगा। इसमें हैरानी वाली बात भी नहीं है लेकिन ईरान कितना नुकसान पहुंचा सकता है, यह देखने वाली बात है।

हमले में आर्थिक चपत
हरमूज की खाड़ी से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार का 40 फीसद तेल गुजरता है और यहां ईरान काफी मजबूत है। वह यहां किसी को भी नुकसान पहुंचाने में सक्षम है। युद्ध हुआ तो तेल की कीमतों में भारी इजाफा होगा और यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिकूल होगा। जानकारों का यह भी मानना है कि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के साथ ही उसके मित्र देश भी ईरान के निशाने पर आ जाएंगे। यमन में हउथी विद्रोहियों के जरिए सऊदी अरब में ड्रोन-मिसाइल से हमले करवा सकता है, ईराक में शिया कट्टरपंथियों के जरिए तो हिजबुल्लाह की मदद से इजरायल व अन्य अमेरिकी प्रतिष्ठानों पर हमले करा सकता है। शिया कट्टरपंथी संगठन बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास को निशाना बना सकते हैं। बता दें कि 9-11 के हमले से पहले तक सबसे अधिक अमेरिकी लोगों की हत्या हिजबुल्लाह ने ही की थी। अब भी लैटिन अमेरिकी देशों में इसकी घुसपैठ है।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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