जेनेवा, एजेंसी। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत गेइर पेडरसन मंगलवार को कहा कि सीरिया में संघर्षरत विरोधी पक्षों ने जेनेवा आने के लिए और  अगले एजेंडे पर वार्ता को राजी हो गए हैं। उन्‍होंने आगे कहा कि विरोधी पक्षों द्वारा इस सहमति के बाद इस परिक्षेत्र में विश्‍वास और शांति की एक नया अवसर प्रदान करता है। उनहोंने कहा कि क्षेत्र में शांति स्‍थापति करन का यह एक बेहतर मौका है। इससे यहां लंबे वक्‍त से चले आ रहे संघर्ष पर भी विराम लगेगा। दोनों पक्ष संविधान पर वार्ता के लिए राजी हो गए हैं।

कोरोना महामारी के प्रकोप घटते ही दोनों पक्ष वार्ता के लिए राजी 

उन्‍होंने कहा कि कोरोना महामारी के प्रकोप घटते ही दोनों पक्षों ने इस बात पर अपनी सहमति प्रगट की है कि जेनेवा की बैठक में भाग लेकर अगले एजेंडा पर वार्ता करेंगे। हालांकि, इस बाबत उन्‍होंने कोई तीथि का ऐलना नहीं किया है। उन्‍होंने कहा संवैधानिक समिति की यह अहम बैठक वर्चुल मीटिंग से संभव नहीं है।

नौ साल पहले शुरू हुई शांतिपूर्ण बगावत पूरी तरह से गृहयुद्ध में तब्दील 

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ नौ साल पहले शुरू हुई शांतिपूर्ण बगावत पूरी तरह से गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है। इसमें अब तक तीन लाख से ज्‍यादा लोग मारे जा चुके हैं। इस गृहयुद्ध में पूरा देश तबाह हो गया है और दुनिया के ताकतवार देश भी आपस में उलझ गए हैं। संघर्ष शुरू होने से पहले ज्‍यादातर सीरियाई नागरिकों के बीच भारी बेरोजगारी, व्यापक भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव और राष्ट्रपति बशर अल-असद के दमन के खिलाफ निराशा थी। बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज अल असद की जगह ली थी। अरब के कई देशों में सत्ता के खिलाफ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था। सीरिया की असद सरकार को यह असहमति रास नहीं आई और उसने आंदोलन को कुचलने के लिए क्रूरता दिखाई। 

विद्रोह को 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार 

वक्‍त के साथ इन विरोधियों ने हथियार उठा लिए। विरोधियों ने इन हथियारों से पहले अपनी रक्षा की और बाद में अपने इलाको से सरकारी सुरक्षाबलों को निकालना शुरू किया। असद ने इस विद्रोह को 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार दिया और इसे कुचलने का संकल्प लिया। दूसरी तरफ विद्रोहियों का गुुस्सा थमा नहीं था वे भी आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार रहे। इस वजह से दोनों पक्षों के बीच हिंसा लगातार बढ़ती गई। इसी संघर्ष में शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हुई। रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब इस्लामिक स्टेट को भी असद के खिलाफ मदद पहुंचा रहा है। सीरिया में तुर्की भी असद के विरोधियों को मदद पहुंचा रहा है। विद्राहियों पर रासायनिक हमला किया गया। इस हमले की यूएन की आपात बैठक में सीरिया की निंदा की गई। 

Posted By: Ramesh Mishra

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