नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। सोमवार की सुबह ऑस्ट्रेलिया में अखबार पढ़ने के शौकीन अपने घरों में आए अखबार को देखकर दंग रह गए। आम दिनों में जिस पहले पन्ने पर शहर की सभी बड़ी खबरें और पूरे अखबार की अन्य खबरों की डिटेल होती थी वो सब गायब थी। पहले पेज पर छपने वाली खबरों की जगह काली स्याही की रेखाएं खींची गई थी और सीक्रेट लिख दिया गया था। एकबारगी तो अखबार को देखकर लोग सोच में पड़ गए मगर बाद में उनको पहले पन्ने की सारी खबरें अंदर के पन्नों पर पढ़ने को मिली। ऑस्ट्रेलिया में हुई इस घटना ने भारत में लगी 1975 की इमरजेंसी की याद दिला दी। साल 1975 में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा की थी, उस दौरान भी अखबारों पर अंकुश लगाया गया था। अखबारों ने अपने-अपने हिसाब से पन्ने पर जगह छोड़ दी थी। इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने अपने संपादकीय टिप्पणी पेज पर खाली जगह छोड़ दी थी। 

भारत ने आजादी के 28 साल बाद झेला था आपातकाल का दंश 

आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण आपातकाल का दंश झेलना पड़ा था। 25-26 जून की रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया था। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना कि भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है, लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर ने पूरे देश में न फैल सके इसके अलावा आइटीओ स्थित अखबारों में काम न हो सके। इसके लिए उनकी बिजली के कनेक्शन काट दिए गए थे। इसके बाद पत्रकार लामबंद हुए फिर इसका विरोध शुरू हुआ।  

सरकार मीडिया पर लगा रही लगाम 

अखबारों ने देश में मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिशों का विरोध करने के लिए ये इस तरह का कदम उठाया। अखबारों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार का सख्त कानून उन्हें लोगों तक जानकारियां लाने से रोक रहा है। दरअसल पहला पन्ना काला रखने का ये तरीका इस साल जून में ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े मीडिया समूह ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (एबीसी) के मुख्यालय और एक पत्रकार के घर पर छापे मारने की घटना को लेकर जारी विरोध के तहत उठाया गया है। ये छापे भी व्हिसल ब्लोअर्स से लीक हुई जानकारियों के आधार पर प्रकाशित किए गए कुछ लेखों के बाद मारे गए थे। 

काली स्याही से पोत दिए गए पहले पेज पर लिखे सारे शब्द 

सभी अखबारों ने अपने पहले पन्ने काले कर दिए और उस पर जो भी शब्द लिखे थे उन सभी को काली स्याही से पोत दिया। उन पर एक लाल मुहर लगा दी जिस पर लिखा था - "सीक्रेट"। इन अखबारों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों की वजह से रिपोर्टिंग पर अंकुश लगाया जा रहा है और देश में एक "गोपनीयता की संस्कृति" बन गई है। सरकार का कहना है कि वो प्रेस की आजादी का समर्थन करती है मगर "कानून से बड़ा कोई नहीं" है।

खबर छापने के बाद मारे गए छापे 

जून में एबीसी के मुख्यालय और न्यूज कॉर्प ऑस्ट्रेलिया के एक पत्रकार के घर पर छापा मारे जाने का काफी विरोध हुआ था। ऑस्ट्रेलिया के मीडिया संगठनों का कहना था कि ये छापे लीक की गई जानकारियों के आधार कुछ रिपोर्टों के प्रकाशन के बाद मारे गए थे। इनमें एक रिपोर्ट में युद्ध अपराध के आरोप लगाए गए थे, जबकि एक अन्य रिपोर्ट में एक सरकारी एजेंसी पर ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की जासूसी का आरोप लगाया गया था।

दुनिया का सबसे गोपनीय लोकतंत्र बनने का खतरा 

न्यूज कॉर्प ऑस्ट्रेलिया के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन ने अपने अखबारों के मुख पृष्ठों की तस्वीर ट्वीट की। उन्होंने सरकार के साथ ही साथ आम लोगों से भी ये सवाल पूछा कि वो हमसे क्या छिपाना चाह रहे हैं? न्यूज कॉर्प के मुख्य प्रतिद्वंद्वी- नाइन - ने भी अपने अखबारों 'सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड' और 'द एज' के मुख पृष्ठ काले छापे हैं। एबीसी के एमडी डेविड एंडरसन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में दुनिया का सबसे गोपनीय लोकतंत्र बनने का खतरा बन रहा है। 

पीएम बोले आजादी महत्वपूर्ण मगर कानून का राज कायम 

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि प्रेस की आजादी महत्वपूर्ण है मगर कानून का राज कायम रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि वो मुझ पर भी लागू होता है और किसी पत्रकार और अन्य लोगों पर भी। ऑस्ट्रेलिया में प्रेस की आजादी पर एक जांच रिपोर्ट अगले साल संसद में पेश की जाएगी। ऑस्ट्रेलिया की सरकार पर आरोप है कि वहां पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा रहा है। वहां की सरकार के उस कानून को हाईकोर्ट में चुनौती भी दी गई है, जिसके तहत सरकार पत्रकार, सूत्र और व्हिसलब्लोअर्स को अरेस्ट कर रही है।

मीडिया के हर वर्ग का समर्थन 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ अखबार ही इसमें शमिल रहे हैं। इस अभियान में राइट टू नो कोएलिशन का कई टीवी, रेडियो और ऑनलाइन समूह भी समर्थन कर रहे हैं। इस तरह का अभियान चलाने वालों का कहना है कि पिछले दो दशकों में ऑस्ट्रेलिया में ऐसे सख्त सुरक्षा कानून लाए गए हैं जिससे खोजी पत्रकारिता को खतरा पहुंच रहा है। पिछले साल नए कानून लाए गए जिसके बाद मीडिया संगठन पत्रकारों और व्हिसलब्लोअर्स को संवेदनशील मामलों की रिपोर्टिंग में छूट दिए जाने के लिए अभियान चला रहे हैं।

60 से अधिक कानून पारित किए गए 

द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई संसद ने पिछले 20 वर्षों में गोपनीयता और जासूसी से संबंधित 60 से अधिक कानून पारित किए हैं। यह वर्तमान में व्हिसलब्लोअर कानूनों की समीक्षा कर रहा है। पिछले दो सालों में 22 कानून पारित किए गए हैं। अखबारों ने पहले पन्ने पर लिखा है कि जब सरकार सच दूर रखती हो, वे क्या कवर करेंगे? 

इन अखबारों ने काले किए पन्ने 
अमेरिकी अखबार द गार्डियन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार #Righttoknow अभियान के तहत अखबारों की ओर से ये कदम उठाया गया। जिन अखबारों के पन्ने काले किए गए हैं, उनमें The Australaian, The Sunday Morning Herald, Financial Reiview, THE Daily Telegraph प्रमुख है।

Posted By: Vinay Tiwari

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