नई दिल्ली, न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस। दुनिया के तमाम देश कोरोनावायरस के कहर को झेल रहे हैं, ऐसे में कई बार ऐसी खोज भी की गई कि आखिर कोरोनावायरस पैदा कहां से हुआ? ये वायरस आया कहां से? अधिकतर लोगों ने इसके पैदा होने की जगह चीन के वुहान प्रांत की वायरोलॉजी लैब या फिर वहां की मीट मार्केट को बताया।

अब कोरोनावायरस को लेकर एक नई बात सामने आ रही हैं हालांकि ये तथ्य अभी किसी मेडिकल जर्नल या कहीं अन्य जगह पर प्रकाशित नहीं हुए हैं मगर ये कहा जा रहा है कि साल 2019 में बार्सिलोना में कोरोनावायरस की पहचान कर ली गई थी। 

वैसे ये रिसर्च अभी तक किसी जर्नल में प्रकाशित नहीं की गई है। मगर वैज्ञानिकों ने मार्च 2019 में बार्सिलोना, स्पेन में गंदे पानी में में कोरोनोवायरस की मौजूदगी पाई थी। रिसर्च में कहा गया है कि चीन के वुहान में कोरोनावायरस मिलने से पहले स्पेन में ये वायरस पाए गए थे।

निष्कर्षों की समीक्षा करने वाले स्वतंत्र विशेषज्ञों ने कहा कि उन्हें वैज्ञानिकों के इस दावे पर संदेह है। उनका कहना है कि जो अध्ययन किए गए हैं वो पूरी तरह से सटीक नहीं मालूम पड़ते हैं। वैसे दुनिया के अधिकतर देशों को यही मालूम है कि कोरोनावायरस के शुरूआती सबूत दिसंबर 2019 में चीन में देखने को मिले थे। चीन में वायरस के सबूत मिल जाने के बाद फरवरी 2020 में स्पेन में इसका संक्रमण फैला था। हजारों की संख्या में लोग इसके संक्रमण का शिकार हुए थे।

एक बात ये भी कही जा रही है कि बार्सिलोना एक पर्यटन स्थल है, चीन से बड़े पैमाने पर लोग घूमने टहलने के लिए बार्सिलोना आते-जाते रहते हैं। हो सकता है कि जो पर्यटक चीन से बार्सिलोना घूमने के लिए गए हो उन्हीं के साथ ये वायरस भी वहां पहुंच गया हो, वहां पर इसके लक्षण मिल गए हो फिर जब वुहान में इससे संक्रमितों की संख्या में इजाफा हुआ उसके बाद इसका पता चला फिर ये दुनिया की नजर में आया।

बार्सिलोना में वायरोलॉजी विश्वविद्यालय में माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एल्ब्रट बॉश बीते 40 सालों से गंदे पानी में पैदा होने वाले कीटाणुओं और अन्य चीजों का अध्ययन कर रहे हैं। उनका कहना है कि बार्सिलोना शहर में बड़े पैमाने पर चीनी लोगों को देखा जाता है, उनसे ही बार्सिलोना का पर्यटन उद्योग चलता है हो सकता है कि उन्हीं लोगों के साथ ये वायरस यहां पहुंचा हो, उसको उस समय गंभीरता से नहीं लिया गया होगा जिसके बाद में नतीजे चौंकाने वाले रहे।

अनुसंधान में शामिल नहीं होने वाले कई विशेषज्ञों ने इस रिसर्च में तमाम कमियों के बारे में बताया। इस तरह के अध्ययन में कई विशेषज्ञों को शामिल किया जाता है, उनकी राय ली जाती है उसके बाद उसका प्रकाशन पत्रिका में होता है। फिलहाल इस अध्ययन के साथ ऐसा नहीं किया गया है। उन्होंने सुझाव दिया कि नमूनों के दूषित या अनुचित भंडारण के कारण परीक्षणों में कई बार गलती हो जाती है इस वजह से ऐसा कहा जा रहा हो कि कोरोनावायरस पहले ही बार्सिलोना में मिल गया था। 

मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के एक पर्यावरण इंजीनियर इरेने जागोरारकी ने कहा कि मुझे परिणामों पर भरोसा नहीं है। बार्सिलोना विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों को ऑनलाइन 13 जून को पोस्ट किया। उनकी अधिकांश रिपोर्ट ने 2020 की शुरुआत से गंदे पानी के उपचार पर शोध का वर्णन किया। मार्च 2019 के बारे में आश्चर्यजनक खोज केवल रिपोर्ट के अंत में संक्षेप में उल्लिखित की गई थी। जब विश्वविद्यालय ने शुक्रवार को एक समाचार जारी किया, तो इस शोध पर अधिक ध्यान गया।

यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका में, शोधकर्ताओं ने पुष्टि की कि मामले सामने आने से पहले गंदे पानी में वायरस के जीन के बढ़ते स्तर का पता चला। इन खोजों ने कई शोधकर्ताओं को पहले के समय से जमे हुए गंदे पानी के नमूनों की जांच करने के लिए प्रेरित किया, जिससे किसी को भी इसके बारे में पता करने से पहले वायरस की उपस्थिति का प्रमाण मिल गया। 

पिछले हफ्ते, इतालवी शोधकर्ताओं ने 18 दिसंबर को मिलान और ट्यूरिन में वायरस को खोजने की सूचना दी, दो महीने पहले उत्तरी इटली में COVID-19 मामलों का सामना किया गया था। स्पेन में, बॉश और उनके  सहयोगियों ने अप्रैल में बार्सिलोना के दो उपचार संयंत्रों से गंदे पानी का साप्ताहिक नमूना लेना शुरू किया शोधकर्ताओं ने स्पेन में महामारी शुरू होने से पहले के महीनों में 2020 के शुरुआती दिनों में कई नमूनों में वायरस पाया।

जब नमूनों में वायरस के लक्षण पाए गए उसके बाद जनवरी 2018 और दिसंबर 2019 के बीच कुछ हफ्तों या महीनों में लिए गए नौ नमूनों की जांच की गई। एक नमूना 12 मार्च 2019 को लिया गया, इसमें वायरस की जांच की गई तो उसके रिजल्ट पॉजिटिव मिले।  

Posted By: Vinay Tiwari

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