नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। चीन के शियामेन शहर में ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए कामयाबी भरा रहा। सम्मेलन में एक तरफ जहां पाकिस्तान की धरती से आतंक फैला रहे आतंकी संगठनों लश्कर, जैश और हक्कानी नेटवर्क का जिक्र किया गया, वहीं मोदी-चिनफिंग मुलाकात में चीन ने माना कि वो पंचशील सिद्धांतों के आधार पर आगे बढ़ेगा और इस तरह से डोकलाम विवाद का समाधान निकल आया। लेकिन डोकलाम के मुद्दे पर पीएलए के मेजर जनरल ने कहा कि चीन में जो लोग भारत विरोध की बात करते हैं उन्हें चीन की रणनीतिक समझ की साफ जानकारी नहीं है। मेजर जनरल किओ लियांग ने कहा कि चीन और भारत एक-दूसरे के पड़ोसी होने के साथ ही विरोधी भी हैं। लेकिन आप सभी विरोधियों को ताकत के बल पर काबू में नहीं कर सकते हैं।

मेजर जनरल किओ की जुबानी डोकलाम विवाद की कहानी

किओ का कहना है कि चीन और भारत के बीच डोकलाम मुद्दे पर तनातनी के बीच चीन में एक धड़ा इस बात का हिमायती था कि भारत को 1962 जैसा सबक सिखाने की जरूरत है। जानकारों का कहना है कि किओ के इस बयान को आप गंभीरता से ले सकते हैं। किओ ने लिखा कि डोकलाम विवाद को उसी तरह से सुलझाया गया, जिस तरीके से सुलझाया जाना चाहिए था। जब आप शांतिपूर्ण तरीके से किसी मामले को सुलझा सकते हों तो देश को युद्ध की तरफ ले जाने का कोई मतलब नहीं है। डोकलाम विवाद सुलझने के बाद पहली बार चीन की तरफ से इतने बड़े स्तर पर बयाना आया है। जिसमें भारत से युद्ध की बात नहीं कही गई है।

किओ का बयान ऐसे समय में आया है जब अगले महीने चीन में शीर्ष नेताओं के अगले बैच को चुना जाएगा। किओ ने 1999 में अनरेस्ट्रिक्टेड वारफेयर नाम की किताब लिखी थी, जिसमें इस बात का जिक्र था कि तकनीकी रूप से आगे अमेरिका को चीन स्मार्ट तरीके से हरा सकता है।


जानकार की राय

Jagran.Com से खास बातचीत में रक्षा मामलों के जानकार राज कादयान ने कहा कि आप भारत-चीन संबंध और डोकलाम के मुद्दे को तीन बिंदुओं पर समझ सकते हैं। उन्होंने बताया कि जिस समय भारत को आजादी मिली देश के नीति निर्माता विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने की योजना बना रहे थे। भारत ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर ही दुनिया के साथ आपसी रिश्तों का बढ़ाने का फैसला किया। लेकिन मैकमोहन लाइन चीन और भारत के बीच विवाद की बड़ी वजह बनी। दोनों देशों ने तनाव को कम करने के लिए पंचशील के सिद्धांतों पर चलने का फैसला किया। लेकिन 1962 में चीन ने भरोसे का कत्ल किया। इन पृष्ठभूमि में दोनों देशों के रिश्ते खराब हो गए। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। दुनिया के सभी कोनों में भारत की धाक बढ़ चुकी है। चीन भी अब भारत की शक्ति को नकार नहीं पा रहा है।  

'डोकलाम पर चीन का फैसला एक तरह से गलत था'

किओ ने डोकलाम पर बोलते हुए कहा कि बहुत से लोग कहेंगे कि अगर चीन अपनी सीमा में सड़क बना रहा था तो उससे भारत का कुछ लेना देना नहीं होना चाहिए था। लेकिन क्या इस तरह का विचार सही है? ये कुछ हद तक सही हो सकता है। डोकलाम इलाके में सड़क निर्माण गलत या सही का सवाल नहीं है। हमें ये समझने की जरूरत है कि किसी भी समय सही काम करना सही नहीं होता है। सच ये है कि सही काम सही समय पर करें। किओ ने कहा कि बहुत से चीनी नेता मानते हैं कि शक्ति के बल पर चीन को सभी दिशाओं में बढ़ना चाहिए। यही नहीं बहुत से लोगों का मानना है कि सिर्फ युद्ध के जरिए ही चीन दुनिया के मानचित्र पर अपनी पहचान को कायम रख सकता है। लेकिन किसी समस्या का समाधान अगर शांति और युद्ध दोनों में हो तो हमें हमेशा शांति का रास्ता अपनाना चाहिए।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए राज कादयान ने कहा कि डोकलाम के मुद्दे पर भारत सरकार ने शुरू से ही संयम के साथ दृढ़ता दिखाई। भारत ने किसी के इलाके में घुसपैठ नहीं की थी। भूटान की अपील पर भारत की सेना के कुछ जवान डोकलाम सीमा पर गए। करीब ढ़ाई महीने तक चले इस विवाद के दौरान चीन की तरफ से न जाने कितनी बार घुसपैठ की कोशिश की गई। लेकिन भारत की तरफ से संयमित व्यवहार दिखाया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से डोकलाम पर भारत की कूटनीति से चीन अलग-थलग पड़ गया। ऐसे हालात में चीन के पास झुकने के अलावा और कोई  विकल्प नहीं था। 

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