टोरंटो, पीटीआइ। विज्ञान की दुनिया में नित नए आविष्कार हो रहे हैं। नए आविष्कारों से चिकित्सा जगत में भी क्रांति आ रही है। लाइलाज बीमारियों का इलाज ढूंढने के साथ ही इलाज को सरल और कम तकलीफदेह बनाने के भी प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नैनो-रोबोटिक्स सिस्टम डिजाइन किया है, जिसका उपयोग कैंसर के प्रकार का अध्ययन करने और इस घातक बीमारी के निदान और उपचार में मदद करने में किया जा सकता है।

साइंस रोबोटिक्स जर्नल में इस नैनो-बॉट के बारे में जानकारियां दी गई हैं। बताया गया है कि यह नैनो-बॉट एक तरह से चुंबकीय चिमटी का सेट है जो अभूतपूर्व सटीकता के साथ एक मानव कोशिका के अंदर त्रि-आयामी आकार में जगह ले सकता है। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के पीएचडी अभ्यर्थी जियान वांग ने बताया कि कोशिकाओं की जांच के लिए एक तकनीक ऑप्टिकल चिमटी भी है। जो लेजर के माध्यम से कोशिकाओं की जांच करती है। इस तकनीक को 2018 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला था, लेकिन वांग ने बताया कि यह उतनी ताकत नहीं पैदा करती है जितनी उनको यांत्रिक हेरफेर या अन्य काम करने के लिए चाहिए होती है।

 इस तरह बनाया नैनो-बॉट:

वांग द्वारा डिजाइन किए गए सिस्टम में छह चुंबकीय कॉइल को माइक्रोस्कोप कवरस्लिप के विभिन्न ओर रखा गया। फिर कवल स्लिप के ऊपर एक कैंसर की कोशिका रखी गई। इसके बाद कैंसर इस कोशिका के पास में एक 700 नैनोमीटर व्यास का चुंबकीय लोहे का मनका (सूक्ष्म कण) रखा, जोकि इंसान के बाल से 100 गुना पतला था। जहां पर कैंशर कोशिका ने आसानी से इसे अपनी झिल्ली के अंदर खींच लिया। मनका के कोशिका के अंदर जाने के बाद वांग ने कंफोकल माइक्रोस्कोपी के माध्यम से मिल रही रियल टाइम लोकेसन से इसको कंट्रोल कर लिया।

ऐसे किया गया प्रयोग

अमेरिका के माउंट सनाइ हॉस्पिटल के हेलेन मैकनील और योनित त्सत्किस के सहयोग से वैज्ञानिकों ने ब्लैडर कैं सर के शुरुआती और अंतिम स्तर की कोशिकाओं का अध्ययन करने के लिए रोबोट प्रणाली का उपयोग किया। शोधकर्ताओं ने बताया कि रोबोटिक प्रणाली के माध्यम से बिना कोशिका की झिल्ली (कोशिका कंकाल) तोड़े कोशिका के नाभिक को मापा। उन्होंने बताया कि रोबोट के माध्यम से यह पता चला कि नाभिक सभी दिशाएं समान रूप से कठोर नहीं है।

उन्होंने यह भी पता लगाया कि छेड़ने पर ये नाभिक किस तरह से प्रतिक्रिया करता है। साथ ही इसके प्रोटीन के स्रोत क्या हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि इस प्रयोग से नए तरीके से कैंसर की डायग्नोसिस करने में मदद मिलेगी। इसके माध्यम से उस स्थिति में जब प्रारंभिक चरण की कैंसर कोशिकाएं और अंतिम चरण की कोशिकाएं लगभग एक जैसी दिखती हैं, उन्हें अलग पहचाना जा सकता है।

Posted By: Dhyanendra Singh

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