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क्या ईरान को रोकने की कोशिश कर रहा अमेरिका? सऊदी अरब के साथ ट्रंप के परमाणु समझौते पर विवाद का पूरा विश्लेषण

Published: Sun, 26 Jul 2026 02:35 PM (IST)

ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका-सऊदी अरब परमाणु समझौते को मंजूरी दी है, जिससे सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धित करने की अनुमति मिल सकती है।

सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौते के जरिए ईरान को क्या संदेश देना चाहते हैं ट्रंप। (फाइल फोटो।)

सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौते के जरिए ईरान को क्या संदेश देना चाहते हैं ट्रंप। (फाइल फोटो।)

HighLights

  1. अमेरिका ने सऊदी अरब को परमाणु समझौता दिया मंजूरी।

  2. यूरेनियम संवर्धन की अनुमति से अप्रसार चिंताएं बढ़ीं।

  3. ईरान से तनाव के बीच क्षेत्रीय संतुलन पर असर।

डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। 22 जुलाई को राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिका-सऊदी अरब परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी। इसके तहत सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धित करने की अनुमति मिल जाएगी ताकि वह अमेरिका द्वारा बनाई गई संवर्धन सुविधा में ईंधन का उत्पादन कर सके।

ईरान से युद्ध के बाद ऐसा लगता है कि इस संकट ने वॉशिंगटन के लिए सऊदी अरब के साथ लंबे समय से अटके एक रणनीतिक समझौते को अंतिम रूप देने का मौका बना दिया है। सऊदी अरब इस क्षेत्र में ईरान का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है।

देखने को मिला बड़ा बदलाव

यह आम तौर पर अपनाए जाने वाले तरीकों से एक बड़ा बदलाव होगा। भारत समेत जिन देशों में नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम हैं वे अपने रिएक्टरों के लिए यूरेनियम को एनरिच (संवर्धित) नहीं करते बल्कि परमाणु ईंधन का आयात करते हैं।

नई डील में ऐसी पाबंदियों के न होने की खबरों ने अमेरिकी सांसदों और इस इलाके की सरकारों के बीच हथियारों के प्रसार के जोखिम को लेकर चिंता बढ़ा दी है। आलोचकों का तर्क है कि सऊदी अरब को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन की इजाजत देने से रियाद को भविष्य में परमाणु बम बनाने की क्षमता मिल सकती है।

टकराव के केंद्र में परमाणु मुद्दा

ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के बीच महीनों से चल रहे टकराव के केंद्र में परमाणु मुद्दा रहा है। अमेरिका के नेतृत्व वाले अभियान का एक मुख्य मकसद यह पक्का करना था कि ईरान कभी परमाणु हथियार न बनाए।

सऊदी अरब के रुख ने भी इस मामले में जांच-पड़ताल को बढ़ावा दिया है। 2018 में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सीबीएस न्यूज से कहा था कि उनका देश परमाणु हथियार हासिल करने की योजना नहीं बना रहा है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अगर ईरान परमाणु बम बनाता है तो हम भी जल्द से जल्द वैसा ही करेंगे।

हालिया समझौते को लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच ट्रंप ने एक नई शर्त रखी है कि सऊदी अरब को अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होना होगा। यह एक कूटनीतिक पहल थी जिसे ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान शुरू किया गया था और इसके तहत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ अपने संबंध सामान्य किए थे।

ट्रंप ने इस बात से भी इनकार किया है कि इस समझौते से सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन करने की इजाजत मिलेगी।

इस डील को लेकर चिंता क्यों हुई?

वॉशिंगटन और रियाद के बीच कई सालों से न्यूक्लियर सहयोग समझौते पर बातचीत चल रही है। इस समझौते से सऊदी अरब को अमेरिकी टेक्नोलॉजी मिल सकेगी और अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने का मौका मिलेगा।

न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (परमाणु अप्रसार संधि) पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देशों की तरह सऊदी अरब ने भी परमाणु बम न बनाने का वादा किया है और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए सहमति दी है लेकिन वॉशिंगटन पारंपरिक रूप से अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की मांग करता रहा है।

हालांकि, सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि इस नए समझौते में गोल्ड स्टैंडर्ड शामिल नहीं है जो सऊदी अरब को यूरेनियम को एनरिच करने और इस्तेमाल हो चुके परमाणु ईंधन की प्रोसेसिंग करने से रोकता है। ये दोनों ही वॉरहेड के लिए जरूरी सामग्री बनाने के संभावित तरीके हैं और न ही इसमें अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय निगरानी वाला एडिशनल प्रोटोकॉल शामिल है।

अमेरिका ने अब तक जितने भी 26 न्यूक्लियर सहयोग समझौते किए हैं, उनमें से लगभग सभी में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के साथ साइन किया गया एडिशनल प्रोटोकॉल शामिल है। इसका मतलब है कि IAEA सभी न्यूक्लियर फैसिलिटीज की अच्छी तरह से जांच कर सकती है। सऊदी अरब के साथ बॉर्डर शेयर करने वाले यूएई ने भी 2009 में अमेरिका के साथ हुए एक समझौते में यूरेनियम एनरिचमेंट न करने पर सहमति जताई थी।

इन बातों को नजरअंदाज करने से पश्चिम एशिया में अमेरिका के सहयोगी देशों (जिनमें इजरायल भी शामिल है) को चिंता हो सकती है और इससे अमेरिका की नीतियों में निरंतरता को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि इस साल ईरान के खिलाफ अमेरिका की कार्रवाई की एक वजह तेहरान का अपने एनरिचमेंट प्रोग्राम को छोड़ने से इनकार करना था।

ट्रंप प्रशासन ने अभी तक कांग्रेस को इस समझौते के बारे में औपचारिक रूप से सूचित नहीं किया है लेकिन डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों ही सांसदों के इस बात पर सवाल उठाने की संभावना है कि इस समझौते में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) की ओर से अतिरिक्त परमाणु निगरानी की कथित कमी है।

क्या ट्रंप इसका इस्तेमाल रणनीतिक बढ़त के तौर पर करेंगे?

सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका का सहयोगी रहा है। वहां कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं जिन्हें ईरानी हमलों में निशाना बनाया गया है। रियाद के साथ 30 साल के नागरिक परमाणु समझौते को आगे बढ़ाकर वाशिंगटन का मकसद सऊदी अरब के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना है और साथ ही तेहरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ आर्थिक और सैन्य संतुलन बनाना है।

हालांकि, ईरान के लिए यह समझौता एक बड़ा झटका है। जैसा कि अमेरिकी रणनीतिक विश्लेषक रोजमेरी केलानिक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "उनका कट्टर दुश्मन (अमेरिका) उनके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को उसके परमाणु कार्यक्रम में बढ़त दिला रहा है।"

केलानिक ने तर्क दिया कि इस डील की वजह से ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे मौजूदा टकराव का जल्द समाधान होने की संभावना कम हो गई है। उन्होंने लिखा, "ईरान निश्चित रूप से अमेरिका पर कम भरोसा करेगा और कोई भी रियायत देने के लिए कम इच्छुक होगा।"

उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते से इस बात की संभावना बढ़ सकती है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को हथियार बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाए। दूसरे एक्सपर्ट्स इस समझौते के तुरंत असर को लेकर ज्यादा संशय में हैं। उनका कहना है कि सऊदी अरब को सिविलियन न्यूक्लियर पावर प्रोग्राम विकसित करने में 10 से 20 साल लग सकते हैं और इस पहल को काफी अंतरराष्ट्रीय जांच और विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

सऊदी अरब परमाणु कार्यक्रम क्यों चाहता है?

दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश के तौर पर सऊदी अरब परमाणु ऊर्जा के लिए कोई स्वाभाविक उम्मीदवार नहीं लगता लेकिन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की आर्थिक योजना के तहत उसका मकसद कार्बन उत्सर्जन कम करना और निर्यात के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता बढ़ाना है।

सऊदी अरब में ज्यादातर बिजली गैस और तेल जलाकर बनाई जाती है। परमाणु ऊर्जा से इसमें से कुछ हिस्से को बदला जा सकता है, जिसमें ज्यादा ऊर्जा की खपत वाले पानी को खारेपन से मुक्त करने (डीसेलिनेशन) और एयर कंडीशनिंग के काम शामिल हैं। इससे सऊदी अरब तेल बेचकर ज्यादा पैसे कमा सकेगा।

हालांकि, सऊदी अरब ने यह भी कहा है कि अगर उसका पुराना दुश्मन ईरान परमाणु हथियार बनाता है तो उसे भी ऐसा ही करना होगा। यह बयान जाहिर तौर पर तेहरान पर दबाव बढ़ाने के मकसद से दिया गया है लेकिन इससे सऊदी अरब की अपनी महत्वाकांक्षाओं को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।

डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस मर्फी ने एक्स पर कहा, "इस समझौते से क्षेत्र में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो जाएगी और ईरान को अपने कार्यक्रम को सीमित करने से और हतोत्साहित किया जाएगा।"

जब ट्रंप प्रशासन यह डील कांग्रेस को सौंप देगा तो सांसदों के पास इसे लागू होने से रोकने के लिए 90 सेशन-दिन होंगे लेकिन ऐसा वे तभी कर पाएंगे जब उनके पास राष्ट्रपति के वीटो को खारिज करने के लिए दो-तिहाई बहुमत हो।

अमेरिका को इतनी जल्दी क्यों है?

एक सिविल न्यूक्लियर डील से अमेरिकी इंडस्ट्री को सऊदी अरब में न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने के कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में बड़ी बढ़त मिलेगी। साथ ही, इससे सऊदी अरब के एटॉमिक प्रोग्राम के बारे में ऐसी जानकारी मिल सकेगी जिससे हथियारों के प्रसार को लेकर वॉशिंगटन की चिंताएं कम हो सकती हैं।

अमेरिका के 1954 के एटॉमिक एनर्जी एक्ट की धारा 123 के तहत वाशिंगटन दूसरे देशों के साथ अहम सिविल न्यूक्लियर सहयोग के लिए समझौते कर सकता है। अगर यह समझौता इस आखिरी चरण में भी विफल हो जाता है तो कई ऐसे देश जिनके पास पहले से ही स्थापित परमाणु उद्योग हैं, उन्होंने सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम में रुचि दिखाई है या उन्हें संभावित साझेदार के तौर पर देखा जा रहा है।

खबरों के मुताबिक, सरकारी कंपनी 'चाइना नेशनल न्यूक्लियर कॉर्प' (CNNC) ने 2023 में एक न्यूक्लियर प्लांट बनाने के लिए बोली लगाई थी। रूस की सरकारी न्यूक्लियर कंपनी 'रोसाटॉम' (Rosatom) ने रियाद के साथ शुरुआती सहयोग समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए हैं। अन्य संभावित दावेदारों में दक्षिण कोरिया (जिसने पड़ोसी देश संयुक्त अरब अमीरात में रिएक्टर बनाए थे) और फ्रांस शामिल हैं।

साझेदार का चुनाव संभवतः तकनीकी क्षमताओं, फाइनेंसिंग और जियोपॉलिटिकल तालमेल पर निर्भर करेगा, जिसमें न्यूक्लियर ईंधन के रखरखाव से जुड़ी शर्तें भी शामिल होंगी।

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