नई दिल्‍ली, रमेश मिश्र। रूस की एस-400 मिसाइल सिस्‍टम को लेकर एक बार फ‍िर भारत और अमेरिका के बीच संबंधों की चर्चा शुरू हो गई है। भारत के दौरे पर आई अमेरिकी उप-विदेश मंत्री वेंडी शर्मन की यात्रा के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्‍या अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाने की तैयार कर रहा है। उनकी यात्रा के क्‍या निहितार्थ है। बदलते अंतरराष्‍ट्रीय परिदृष्‍य में भारत के लिए रूस और अमेरिका के साथ रिश्‍तों को संतुलित करने की क्‍या है बड़ी चुनौती। इन सारे मुद्दो पर जानते हैं प्रो. हर्ष वी पंत (आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में निदेशक, अध्ययन और सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख) की राय।

भारत के समक्ष क्‍या धर्मसंकट है ?

निश्चित रूप से एस-400 मिसाइल पर अमेरिकी रुख भारत के लिए धर्मसंकट का विषय है। दरअसल, शीत युद्ध के दौरान भारत और रूस यानी सोवियत संघ के साथ मधुर संबंध रहे हैं। उस वक्‍त भारत का स्‍टैंड साफ था। दूसरी ओर करीब डेढ़ दशक से अंतरराष्‍ट्रीय परिदृष्‍य मे काफी बदलाव आया है। करीब 15 वर्षों से भारत और अमेरिका के बीच सुरक्षा साझेदारी बढ़ी है। भारत में उदारीकरण के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में प्रगाढ़ता आई है। क्‍वाड के गठन के बाद दोनों देश एक-दूसरे के नजदीक हुए हैं। भारत, रूस के साथ अपनी पुरानी दोस्‍ती के साथ अपनी रणनीतिक जरूरतों के प्रति संजीदा है। दूसरे, रूसी एस-400 मिसाइल भारत की रक्षा प्रणाली के लिए भी जरूरी है। ऐसे में दोनों देशों के बीच संबंधों को बनाए रखना भारतीय कूटनीति के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह भारत के लिए एक धर्मसंकट की स्थिति है।

भारत के लिए क्‍यों जरूरी है रूस ?

देखिए, भारत और अमेरिका भले ही रणनीतिक रूप से एक-दूसरे के समीप आए हैं, लेकिन भारत अब भी अपनी रक्षा जरूरतों का 80 फीसद से ज्‍यादा सैन्‍य उपकरण रूस से ही खरीदता है। हाल के वर्षों में इजरायल और अमेरिका भी भारत के लिए एक मजबूत रक्षा साझेदार के रूप में उभरे हैं।

रूस के साथ भारत का रक्षा सौदा एस-400 तक ही सीमित नहीं है। रूस भारत की तीनों सेनाओं के लिए रक्षा उपकरण मुहैया कराता रहा है। भारतीय वायु सेना में रूसी मिग-29 और सुखोई-30 अत्‍यंत प्रभावकारी हैं। इसी तरह से नौ सेना के बेड़े में भी रूसी जेट और पोत शामिल हैं। भारत ने रूस से परमाणु शक्ति से लैस सबमरीन का भी आर्डर दिया है। भारत और रूस के बीच एक मजबूत रक्षा सहयोग है। यह समाप्‍त नहीं हो सकता। स्‍टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2010 से 2019 तक रूस ने अपने हथ‍ियार निर्यात का एक-तिहाई हिस्‍सा भारत को बेचा है।

हालांकि, रूस-पाकिस्‍तान की समीपता और चीन सीमा विवाद पर मास्‍को की चुप्‍पी ने भारत को बेहद निराश किया है। रूस ने पूरे मामलों पर चुप्‍पी रखकर अपने स्‍टैंड को साफ कर दिया है। रूस का इशारा साफ था कि भारत को अपनी सुरक्षा स्‍वयं करनी होगी इस मामले में रूस तटस्‍थ रहेगा। दरअसल, रूस का यह स्‍टैंड विश्‍व के तेजी से बदल रहे परिदृष्‍य का नतीजा है।

अमेरिकी उप विदेश मंत्री की इस यात्रा का क्‍या मकसद है ?

भारत के दौरे पर आईं अमेरिकी उप विदेश मंत्री वेंडी शर्मन की इस यात्रा को इसी कड़ी के रूप में देखना चाहिए। अमेरिकी उप विदेश मंत्री का यह भारत दौरा ऐसे समय हो रही है, जब भारत रूसी मिसाइल सिस्‍टम को शामिल करने के लिए अपनी प्रक्रिया को अंतिम रूप दे रहा है। भारत-रूस के इस सौदे से वह पूरी तरह से असहज थीं। उन्‍होंने इस रक्षा सौदे को खतरनाक बताया है। 

शर्मन का यह स्‍टैड बताता है कि अमेरिका एस-400‍ मिसाइल पर अपने पूर्व के स्‍टैंड पर कायम है। शर्मन ने अपनी इस यात्रा में साफ कर दिया कि एस-400 मिसाइल सौदे को लेकर बाइडन प्रशासन की नीति क्‍या है। इस मुद्दे को शर्मन ने राष्‍ट्रीय सुरक्षा सुलाहकार अजित डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर के समक्ष भी उठाया है। उन्‍होंने भारत के विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला से भी इस सौदे को लेकर चिंता जाहिर की है। हालांकि, शर्मन ने अपनी वार्ता के दौरान एक सकारात्‍मक संदेश भी दिया है कि दोनों पक्ष इस मुद्दे को सुलझा लेंगे।

क्‍या भारत इस मुद्दे को शांति से सुलझा लेगा ?

भारत को इस रक्षा सौदे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए भारत को कूटनीति को धार देना होगा। अमेरिका को यह भरोसा दिलाना होगा कि इस सौदे से नई दिल्‍ली और वाशिंगटन के रिश्‍तों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह रक्षा सौदा भारत की सामरिक जरूरत है। भारत को यह ध्‍यान रखना होगा कि एस-400 मिसाइल को लेकर वह कितना सख्‍त रुख अपना सकता है, क्‍योंकि इस रक्षा सौदे को लेकर अमेरिका तुर्की पर प्रतिबंध लगा चुका है।

क्‍या तुर्की की तरह अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगा देगा ?

भारत, अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी और रणनीतिक साझेदार है। जहां तक सवाल अमेरिकी प्रतिबंधों का है, तो इसे लेकर भी अमेरिकी राजनेताओं में दो फाड़ है। एक भारत के पक्ष में है तो दूसरा भारत विरोधी है। उन्‍होंने कहा कि हमें लगता है कि इसमें भारत के साथ अमेरिकी सहयोग का पलड़ा भारी है। यह भारतीय कूटनीति के लिए एक बेहतर स्थिति है। अमेरिका को यह समझाना होगा कि चीन के बढ़ते तनाव के बीच यह करार उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। भारत को यह साफ करना होगा कि हम एक संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्‍ट्र हैं। हम अपने सुरक्षा दायित्‍व को पूरा करने के लिए भी स्‍वतंत्र हैं। इसमें किसी अन्‍य देश को दखल नहीं देना चाहिए।

अगर अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाया तो बड़ी गलती करेगा। कायदे से अमेरिका को इस सौदे का स्‍वागत करना चाह‍िए। पूरे यूरेशिया में जब चीन से सामना करने की बात आएगी तो अमेरिका को भारत की जरूरत पड़ेगी न कि भारत को अमेरिका की। भारत के लिए अमेरिका अहम साझेदार है। अमेरिका के लिए इस इलाके में भारत एकमात्र ऐसा दोस्‍त है, जो चीन को चुनौती देना चाहता है। अमेरिका चीन के साथ अपने संबंधों का समाधान चाहता है तो उसे भारत के मामले में प्रतिबंधों को लेकर धैर्य दिखाना होगा।

Edited By: Ramesh Mishra