अमेरिका: अलास्का सीनेट चुनाव में एक ही नाम के दो उम्मीदवार, हार के डर से ट्रंप प्रशासन ने दायर किया मुकदमा
अलास्का सीनेट चुनाव में एक जैसे नाम के दो उम्मीदवारों के पेंच और ट्रंप प्रशासन के न्याय विभाग (DOJ) के हस्तक्षेप ने अमेरिकी राजनीति में नया भूचाल ला दिया है।
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अलास्का सीनेट चुनाव में विवाद।
HighLights
अलास्का सीनेट चुनाव में दो उम्मीदवारों के नाम समान।
न्याय विभाग ने नतीजों को प्रमाणित न करने का मुकदमा किया।
ट्रंप ने इसे चुनावी धोखाधड़ी बताया, कानूनी लड़ाई जारी।
डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। अमेरिका में चुनावी राजनीति कब क्या नया मोड़ ले ले, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। ऐसा ही कुछ अलास्का राज्य के सीनेट चुनाव में हुआ।
यह चुनाव एक ऐसी अजीबोगरीब स्थिति में फंस गया है, जिसने अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप प्रशासन को सीधे मैदान में उतरने के लिए मजबूर कर दिया।
पहले जानिए क्या है पूरा मामला?
पूरे मामले को ऐसे समझिए कि अलास्का सीनेट सीट के लिए मौजूदा रिपब्लिकन सांसद डैन सुलिवन और डेमोक्रेट पार्टी की मैरी पेल्टोला के बीच मुकाबला है। अब इसमें अजीबोगरीब स्थिति यह है कि बैलेट पेपर पर एक अन्य उम्मीदवार का नाम भी 'डैनियल जे. सुलिवन' है।

विवाद का कारण यह है कि रिपब्लिकन पार्टी और खुद राष्ट्रपति ट्रंप का आरोप है कि यह दूसरा 'डैनियल' एक सोची-समझी चाल है ताकि वोटर भ्रमित हों और रिपब्लिकन सांसद के वोट कट जाएं।
अमेरिकी न्याय विभाग ने दायर किया मुकदमा
ऐसे में अब इस मामले में नया मोड़ तब आया, जब अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने एक संघीय अदालत में मुकदमा दायर कर दिया है कि अगर रिपब्लिकन उम्मीदवार डैन सुलिवन यह चुनाव हारते हैं, तो राज्य सरकार इस चुनाव के नतीजों को प्रमाणित यानी आधिकारिक घोषित न करे।
चुनाव में भ्रम का जाल और 'रैंक-च्वाइस वोटिंग' के मायने क्या?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि अलास्का में 'रैंक-च्वाइस वोटिंग' की व्यवस्था है। इसका मतलब है कि वोटर अपनी पसंद के हिसाब से उम्मीदवारों को प्राथमिकता (1, 2, 3...) देते हैं।
अब चूंकि मुख्य रिपब्लिकन उम्मीदवार और दूसरे स्वतंत्र उम्मीदवार दोनों का नाम लगभग एक जैसा है, इसलिए डर यह है कि भ्रम में आकर वोटर दोनों को ही वोट दे सकते हैं। अब गौर करने वाली बात यह भी है कि अलास्का की अदालत पहले ही इस दूसरे उम्मीदवार को हटाने की रिपब्लिकन पार्टी की मांग ठुकरा चुकी है, जिससे यह कानूनी उलझन और बढ़ गई है।
सरकार और DOJ का क्या कहना है?
बता दें कि ट्रंप प्रशासन के आने के बाद से न्याय विभाग (DOJ) के राजनीतिक मामलों में दखल को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। अमेरिकी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच का कहना है कि DOJ का मकसद चुनावों में गलत तरीके से दखल देना नहीं है, बल्कि चुनाव की शुचिता बचाना है।
दूसरी तरफ, कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुकदमे का कोई मजबूत कानूनी आधार नहीं है। कानून DOJ को इस तरह चुनाव परिणाम रोकने की अनुमति नहीं देता। आलोचकों का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन अपनी पार्टी की हार की संभावना को देखते हुए पहले से ही चुनावी नतीजों को बाधित करने की कोशिश कर रहा है।
ट्रंप ने बताया धोखाधड़ी
वहीं मामले में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया और अपनी रैलियों में इस स्थिति को धोखाधड़ी बताया है। उनका कहना है कि वे इस फर्जी उम्मीदवार को हटाने और चुनाव में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए हर संभव कानूनी विकल्प तलाश रहे हैं।
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हालांकि दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिकी राजनीति में प्रतिद्वंद्वी के वोट काटने के लिए मिलते-जुलते नाम वाले उम्मीदवार खड़े करने की पुरानी तिकड़म रही है। रिपब्लिकन पार्टी पर भी ओहायो राज्य में ऐसे ही हथकंडे अपनाने के आरोप लग चुके हैं।
अलास्का सीनेट चुनाव कितना अहम
गौरतलब है कि अलास्का का यह सीनेट चुनाव केवल एक राज्य की लड़ाई नहीं है, बल्कि इससे यह तय होगा कि अमेरिकी सीनेट पर किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा। ऐसे में न्याय विभाग के इस मुकदमे और 'रैंक-च्वाइस वोटिंग' की पेचीदगी के कारण इस चुनाव के अंतिम परिणाम आने में हफ्तों का समय लग सकता है।
दूसरी तरफ इस बात की भी संभावना सातवें आसमान पर है कि अगर चुनाव का नतीजा रिपब्लिकन पार्टी के पक्ष में नहीं गया, तो यह मामला अमेरिका की अदालतों में एक बहुत बड़ी कानूनी और संवैधानिक लड़ाई का रूप ले सकता है।
