जलवायु रक्षा की जंग में पिछड़ी दुनिया, अमेरिका बना सबसे बड़ा गुनहगार; ग्लोबल वार्मिंग पर UN की रिपोर्ट ने चेताया
संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया जलवायु परिवर्तन से निपटने में पिछड़ रही है, और अमेरिका के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी और गर्म होगी।

संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट: दुनिया जलवायु परिवर्तन से निपटने में पिछड़ी

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डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिशों में दुनिया और पिछड़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, मानवता ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रही है जो विशेषज्ञों के पिछले साल के अनुमान से भी ज्यादा गर्म होगी।
इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की जलवायु संबंधी गणनाओं के अनुसार, अगर सभी देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के अपने वादे पूरे करते हैं, तब भी पृथ्वी का तापमान मौजूदा स्तर से 1.2 डिग्री सेल्सियस और बढ़ सकता है।
बुधवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया, 'पेरिस समझौते से अमेरिका के औपचारिक रूप से हटने और ऐतिहासिक उत्सर्जन के अनुमानों में संशोधन के कारण यह नतीजा पिछले साल की अपेक्षा बदतर है।'
दुनिया जलवायु परिवर्तन से निपटने में पिछड़ी
रिपोर्ट ने पिछले साल उत्सर्जन में बढ़ोतरी के लिए भी अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है। इसमें कहा गया कि दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बाकी सभी देशों ने कार्बन प्रदूषण घटाया।
लेकिन अमेरिका में उत्सर्जन की बढ़ोतरी (कार्बन डाइआक्साइड समतुल्य 133 मेगाटन) बाकी सभी देशों की तुलना में कहीं अधिक थी। इसकी वजह बिजली की बढ़ती मांग और कोयला आधारित बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी थी।'
जर्मनी के पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फार क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च के निदेशक योहान राकस्ट्रोम ने कहा कि अमेरिका का असर संयुक्त राष्ट्र की गणना से भी अधिक होने की आशंका है।
रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका ऐन ओलहाफ ने कहा कि अमेरिकी नीति में बदलाव से सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में एक-दसवां डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी होने की आशंका है।
यूरोपीय देशों में बढ़ा सर्वाधिक उत्सर्जन
जिन 124 देशों में उत्सर्जन बढ़ा उनमें ज्यादातर यूरोपीय देश हैं। इनमें वह 63 देश शामिल नहीं हैं, जहां ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आई है। उन्होंने 2025 में कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन में 18.9 करोड़ टन की बढ़ोतरी की।
इसका 70 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से आया। जलवायु योजनाओं की निगरानी संस्था क्लाइमेट एनालिटिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और जलवायु विज्ञानी बिल हेयर ने कहा, 'अमेरिका नवीकरणीय ऊर्जा को रोकने को पूरी ताकत लगा रहा है।
जबकि तापमान में एक-दसवां डिग्री की अतिरिक्त बढ़ोतरी से 14 करोड़ और लोग 'खतरनाक गर्म परिस्थितियों' में पहुंच जाएंगे। अमेजन वर्षावन या ग्रीनलैंड व अंटार्कटिका की हिमचादरों के ढहने की आशंका भी बढ़ेगी।
नियम से चले तो 2100 में तापमान 2.6 डिग्री अधिक
अगर देश संयुक्त राष्ट्र को सौंपी गई अपनी जलवायु योजनाओं के सभी वादे पूरे करते हैं, तो 2100 तक दुनिया का तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर से 2.6 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा।
अगर दुनिया वादों के बिना मौजूदा राह पर चलती रही, तो 19वीं सदी के उत्तरार्ध की तुलना में तापमान 2.8 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा।
वैश्विक तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा
दुनिया का तापमान अब औद्योगिक युग से पहले के स्तर से 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक है। रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने माना कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री के उस लक्ष्य तक सीमित करना अब संभव नहीं, जिसे उन्होंने अपनाया था।
अधिकारी तापमान वृद्धि को करीब 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने और फिर हवा से इतनी कार्बन डाइआक्साइड निकालने की उम्मीद कर रहे हैं कि तापमान फिर 1.5 डिग्री तक नीचे आ जाए।
(न्यूज एजेंसी AP के इनपुट के साथ)
